गोंड महासभा धमधागढ़ में बदले की आग: एकता की जगह पुतला दहन, आदिवासी समाज किस राह पर?

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दुर्ग (आदिनिवासी)। केंद्रीय गोंड महासभा धमधागढ़, दुर्ग – जो कभी आदिवासी एकता का प्रतीक था – आज दो गुटों की आपसी रंजिश की आग में जल रहा है। आज सोमवार को हुई आक्रोश रैली और धरना प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया कि गत 7 मई को कमलेश शोरी गुट ने जो पुतला दहन किया था, उसका बदला आज एम.डी. ठाकुर गुट ने पूरी तरह चुका दिया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जिला प्रशासन मूकदर्शक बना रहा – न कोई हस्तक्षेप, न कोई रोक।

बदले की राजनीति, समाज की बर्बादी

7 मई को कमलेश शोरी गुट ने संगठन के चुनाव परिणामों को धांधली बताते हुए एम.डी. ठाकुर गुट के पदाधिकारियों का पुतला फूंका था। उस दिन भी प्रशासन खामोश रहा। आज ठाकुर गुट ने वही काम किया – शोरी गुट का पुतला दहन।

यह महज दो गुटों की लड़ाई नहीं है। यह उस पूरे आदिवासी समाज के भीतर दरकती एकता की तस्वीर है, जिसे बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अपनों की महत्वाकांक्षा से खतरा है।

उल्लेखनीय है कि माननीय न्यायालय पहले ही एम.डी. ठाकुर को संगठन का वैध विजेता घोषित कर चुका है। फर्म एवं सोसायटी के पंजीयक का निर्णय भी उनके पक्ष में है। इसके बावजूद कमलेश शोरी गुट ने परिणाम स्वीकार करने से इनकार करते हुए पुतला दहन का रास्ता चुना – और अब ठाकुर गुट ने भी वही जवाब दिया।

सवाल जो समाज से पूछे जाने चाहिए

– क्या चुनाव परिणाम न मानना और पदाधिकारियों का पुतला जलाना एकता की नई परंपरा है?
– न्यायालय के फैसले का सम्मान न करना – यह किस तरह की सामाजिक चेतना है?
– जब समाज के नेता ही आपस में लड़ रहे हों, तो जल-जंगल-जमीन की लड़ाई कौन लड़ेगा?

एम.डी. ठाकुर अब तक न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हुए चुप रहे – लेकिन चुप रहना कमज़ोरी नहीं थी। आज उनके गुट ने जो किया, वह भले ही “बदला” था, लेकिन इससे भी समाज का भला नहीं हुआ।

टूटता समाज, बिखरती ताकत

छत्तीसगढ़ का गौरवशाली गोंड समाज – और व्यापक रूप से पूरा आदिवासी समाज – आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एकजुटता सबसे ज़रूरी है। छत्तीसगढ़ में जल, जमीन और जंगल पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। कॉर्पोरेट घरानों और सरकारी नीतियों के सामने आदिवासी अस्तित्व की लड़ाई कमज़ोर पड़ती जा रही है।

ऐसे में जब समाज के नेता एक-दूसरे का पुतला जला रहे हों, तो आदिवासी अस्मिता, आत्मसम्मान और अस्तित्व की रक्षा कैसे होगी?

समाज के शीर्ष नेतृत्व को अब गंभीरता से सोचना होगा। यह लड़ाई न कमलेश शोरी की है, न एम.डी. ठाकुर की – यह लड़ाई उस पूरी पीढ़ी की है जो देख रही है कि उनके नेता सत्ता की कुर्सी के लिए समाज की एकता को दाँव पर लगा रहे हैं।

अब आगे का रास्ता क्या?
अगर गोंड महासभा, संगठन और आदिवासी समाज को अपनी एकता और संघर्ष जारी रखना है, तो न्यायालय के फैसलों का सम्मान करना होगा, संगठनिक चुनावों को स्वीकार करना होगा, और अपनों के पुतला दहन की जगह संवाद, एकता, सम्मान और समन्वय का रास्ता अपनाना होगा। अन्यथा यह आग केवल पुतलों को नहीं – बल्कि पूरे आदिवासी समाज की उम्मीदों को जलाकर राख कर देगी।

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