छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद: व्यक्ति केंद्रित राजनीति से परे बड़े सांगठनिक लक्ष्यों की मांग

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रायपुर (आदिनिवासी)। छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद के भीतर नेतृत्व, कार्यशैली और सांगठनिक प्राथमिकताओं को लेकर वैचारिक मतभेद सतह पर आ गए हैं। संगठन के संस्थापक सदस्य हरेंद्र कुमार नेताम के द्वारा परिषद के प्रदेश अध्यक्ष के.आर. शाह के हाशिए पर होने और उनके खिलाफ षड्यंत्र के आरोपों के बाद, आदिवासी समाज के भविष्य को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। यह आंतरिक गतिरोध ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य का आदिवासी समाज गरीबी, अशिक्षा और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहा है।

नेतृत्व का ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान चिंताएं
छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद के संस्थापक सदस्य हरेंद्र कुमार नेताम ने संगठन के पुराने दौर को याद करते हुए प्रदेश अध्यक्ष के.आर. शाह के योगदान को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि विगत 35 वर्षों के अनुभव में श्री के.आर. शाह जैसा समर्पित और मुस्तैद समाज प्रमुख नहीं देखा गया।
नेताम के अनुसार, शाह के कार्यकाल में प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ बेहद आक्रामक और रणनीतिक तरीके से लड़ाई लड़ी जाती थी। यदि स्थानीय स्तर पर थाना प्रभारी (टीआई) या अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) पीड़ितों की शिकायत पर कार्रवाई नहीं करते थे, तो मामले को सीधे पुलिस अधीक्षक (एसपी) या कलेक्टर तक ले जाया जाता था। वहां भी अनदेखी होने पर सीधे पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), गृहमंत्री या मुख्यमंत्री से संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जाती थी।

आंतरिक षड्यंत्र के आरोप और सामाजिक दशा
हरेंद्र कुमार नेताम ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब श्री शाह दुर्ग के जिलाध्यक्ष और बाद में छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर परिषद के प्रदेश अध्यक्ष बने, तब उनका सामाजिक प्रभाव जबरदस्त था। लेकिन उनके इस कड़े नेतृत्व को समाज के ही कुछ हिस्सों में पसंद नहीं किया गया।
“जिस समाज में अच्छे और योग्य व्यक्तियों को सामाजिक कार्यों से दूर रखने का षड्यंत्र रचा जाता है, उस समाज के पतन को रोकना मुश्किल होता है। आदिवासियों की वर्तमान बदतर स्थिति इसी का नतीजा है।”
— हरेंद्र कुमार नेताम, संस्थापक सदस्य, छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद।

सांगठनिक दृष्टिकोण: वहम या हकीकत?
इस पूरे मामले पर संगठन के भीतर एक दूसरा और अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण भी सामने आया है। विश्लेषकों और सांगठनिक सूत्रों का मानना है कि के.आर. शाह को पूरा आदिवासी समाज आज भी उतना ही सम्मान देता है और उनके सुलझे हुए नेतृत्व की सराहना करता है। ऐसे में उनके ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के षड्यंत्र की बात केवल एक गलतफहमी या ‘वहम’ प्रतीत होती है।
यह माना जा रहा है कि परिषद के कुछ पदाधिकारियों में नेतृत्व को लेकर आत्मविश्वास की कमी आई है, जिसके कारण वे इस तरह की असुरक्षा की भावना से घिर गए हैं। संगठन के भीतर से ही यह आवाज उठ रही है कि नेतृत्वकारी साथियों को इस व्यक्तिगत राजनीति और असुरक्षा की भावना से ऊपर उठना होगा।

व्यक्ति से बड़ा संगठन और समाज का लक्ष्य
इस विवाद के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात उभरकर सामने आई है, वह यह है कि किसी भी समाज, संगठन या सामाजिक हितों के लिए आंदोलन का लक्ष्य किसी व्यक्ति या पदाधिकारी से हमेशा बड़ा होता है। व्यक्ति आते-जाते रहते हैं, लेकिन समाज की सामूहिक लड़ाई निरंतर चलती रहती है।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के सामने कई बड़ी और बुनियादी चुनौतियां खड़ी हैं:
🔸कॉर्पोरेट शोषण: प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आदिवासियों के विस्थापन की बढ़ती घटनाएं।
🔸आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन: गरीबी, भुखमरी और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।
🔸अशिक्षा: दूरदराज के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी।

आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई को किसी एक चेहरे या आंतरिक गुटबाजी में उलझाकर नहीं रखा जा सकता। छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद के भीतर की यह हलचल यह साफ संकेत देती है कि अब आत्मनिरीक्षण का समय आ गया है। संगठन को यदि प्रासंगिक बने रहना है, तो उसे काल्पनिक षड्यंत्रों के दायरे से बाहर निकलकर एक नई, प्रगतिशील और सकारात्मक रणनीति अपनानी होगी। समय की मांग है कि अटूट और चट्टानी एकता के साथ जल, जंगल और जमीन की बुनियादी लड़ाई को नए सिरे से लड़ा जाए, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति को उसका हक मिल सके।

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