श्रम विवादों में बरकरार रहेगा ‘ट्रिपल टेस्ट’
AICCTU ने उठाया श्रमिक संरक्षण का सवाल
नई दिल्ली (आदिनिवासी)। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को State of Uttar Pradesh बनाम Jai Bir Singh मामले में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि लंबित मामलों में 1978 के Bangalore Water Supply and Sewerage Board बनाम A. Rajappa फैसले में निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ लागू रहेगा।
‘इंडस्ट्री’ शब्द की कानूनी व्याख्या लंबे समय से श्रम कानून का महत्वपूर्ण विषय रही है। 1978 में सर्वोच्च न्यायालय ने Bangalore Water Supply मामले में इसका अपेक्षाकृत व्यापक अर्थ निर्धारित किया था। अदालत ने यह देखने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ विकसित किया कि कोई गतिविधि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ‘इंडस्ट्री’ है या नहीं।
इस कसौटी के तीन प्रमुख आधार थे—संगठित और व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग तथा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण। इस व्यापक दृष्टिकोण के कारण अस्पताल, विश्वविद्यालय और कुछ गैर-लाभकारी संस्थाओं जैसी गतिविधियों के संबंध में भी ‘इंडस्ट्री’ की बहस सामने आई।
बाद में State of U.P. बनाम Jai Bir Singh मामले में इस फैसले की शुद्धता पर सवाल उठा और मामला बड़ी पीठ के पास गया। अंततः नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 20 अगस्त 2026 को अपना फैसला सुनाया।
लंबित मामलों के लिए पुरानी कसौटी बरकरार
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू यह है कि Bangalore Water Supply का ट्रिपल टेस्ट लंबित औद्योगिक विवाद अधिनियम मामलों में लागू रहेगा। हालांकि कुछ न्यायाधीशों की राय में इस कसौटी को कुछ हद तक पुनर्गठित करने की बात सामने आई, लेकिन इससे लंबित मामलों के लिए लागू कानूनी स्थिति नहीं बदली।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह सवाल भी था कि 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code) का ‘इंडस्ट्री’ संबंधी प्रावधान पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम की व्याख्या को प्रभावित कर सकता है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि नए कानून की व्याख्या को पुराने कानून पर काल्पनिक आधार पर लागू नहीं किया जा सकता।
फैसला आया ऐसे समय, जब पुराना कानून समाप्त हो चुका है
इस मामले की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका समय है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस कानून की धारा 2(जे) की व्याख्या पर विचार किया, वह अब प्रभावी कानून नहीं है। 2026 में औद्योगिक संबंध संहिता लागू होने के बाद औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का स्थान नए श्रम कानून ने ले लिया है। इसलिए इस फैसले का प्रत्यक्ष प्रभाव मुख्यतः उन पुराने विवादों पर पड़ेगा, जो पुराने कानून के तहत लंबित हैं।
यही कारण है कि फैसले का महत्व केवल तत्काल कानूनी परिणामों तक सीमित नहीं है। यह भारतीय श्रम कानून के विकास में ‘इंडस्ट्री’ की अवधारणा और श्रमिक संरक्षण की न्यायिक सोच को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
नई औद्योगिक संबंध संहिता पर बहस अलग
औद्योगिक संबंध संहिता के तहत ‘इंडस्ट्री’ की नई परिभाषा पुराने कानून से अलग कानूनी ढांचा प्रस्तुत करती है। इसके कारण यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि किन गतिविधियों और संस्थानों में काम करने वाले श्रमिकों को औद्योगिक विवाद संबंधी संरक्षण मिलेगा और किन्हें इसके बाहर रखा जाएगा।
यह बहस विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अर्थव्यवस्था में ठेकाकरण, अस्थायी रोजगार और निजीकरण बढ़ने के साथ रोजगार संबंधों का स्वरूप भी बदल रहा है। किसी प्रतिष्ठान को कानून के दायरे में शामिल किया जाना केवल कानूनी शब्दावली का प्रश्न नहीं है; इसका संबंध श्रमिकों की शिकायतों, विवादों के समाधान और रोजगार संबंधी अधिकारों से भी है।
AICCTU ने उठाया श्रमिक संरक्षण का सवाल
एआईसीसीटीयू (All India Central council of trade unions – ऐक्टू) के राष्ट्रीय महासचिव राजीव डिमरी ने फैसले के संदर्भ में श्रमिकों के गरिमापूर्ण और मानवीय कार्य-परिस्थितियों को संवैधानिक दायित्व से जोड़ते हुए श्रम संहिताओं पर चिंता व्यक्त की है।
कॉमरेड डिमरी ने कहा कि पूंजी और श्रम के बीच असमानता की स्थिति में राज्य की भूमिका कमजोर और असुरक्षित श्रमिकों को संरक्षण देने की होनी चाहिए। संगठन ने निजीकरण, ठेकाकरण और श्रमिकों के रोजगार संबंधों में बढ़ती अस्थिरता को लेकर अपना विरोध दोहराया है।
हालांकि ये एआईसीसीटीयू के विचार हैं, इन्हें सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। अदालत का फैसला मुख्यतः औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे), Bangalore Water Supply के ट्रिपल टेस्ट और लंबित मामलों पर उसके प्रभाव से संबंधित है।
श्रमिकों के लिए इसका क्या अर्थ?
इस फैसले से पुराने कानून के तहत लंबित औद्योगिक विवादों में कानूनी स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टता आई है। वहीं, भविष्य के विवादों में औद्योगिक संबंध संहिता की व्याख्या निर्णायक होगी।
– पुराने कानून के लंबित मामलों में Bangalore Water Supply का ट्रिपल टेस्ट लागू रहेगा।
– नए विवादों में औद्योगिक संबंध संहिता का कानूनी ढांचा महत्वपूर्ण होगा।
– ‘इंडस्ट्री’ की नई परिभाषा की न्यायिक व्याख्या भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
– श्रमिक संगठनों के लिए रोजगार सुरक्षा और कानूनी संरक्षण का सवाल आगे भी केंद्रीय मुद्दा रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पुराने कानून के लंबित मामलों के लिए स्थिति स्पष्ट कर दी है, लेकिन श्रम अधिकारों की व्यापक बहस समाप्त नहीं हुई। अब वास्तविक परीक्षा औद्योगिक संबंध संहिता की व्याख्या और उसके व्यवहारिक प्रभाव में होगी। आम श्रमिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि बदलते रोजगार संबंधों के बीच उसे विवाद समाधान, सम्मानजनक कार्य और कानूनी संरक्षण कितनी प्रभावी ढंग से मिल पाता है।




