वीबी-ग्रामजी नियम भेदभावपूर्ण, मनरेगा को जारी रखे सरकार: बृंदा करात ने केंद्र को लिखा पत्र

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नई दिल्ली (आदिनिवासी)। केन्द्र सरकार द्वारा लागू किए जा रहे नए ग्रामीण रोजगार कानून ‘वीबी-ग्रामजी’ (विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका मिशन) के नियमों को लेकर नीतिगत और जमीनी विवाद खड़ा हो गया है। माकपा की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिखकर इन नए नियमों को भेदभावपूर्ण, तकनीकी रूप से दोषपूर्ण और देश के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है। करात ने आगाह किया है कि बिना व्यापक विचार-विमर्श के मनरेगा को बंद कर इस नई व्यवस्था को थोपना ग्रामीण कामकाजी गरीबों, विशेषकर महिलाओं और आदिवासियों के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।

यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है जब देश में मनरेगा के भविष्य और नए ‘वीबी-ग्रामजी’ अधिनियम को लेकर बहस गर्म है। पिछले साल दिसंबर में मनरेगा को व्यावहारिक रूप से समाप्त किए जाने के बाद संसद को भरोसा दिलाया गया था कि नई व्यवस्था पूरी तरह चालू होने तक पुरानी व्यवस्था के तहत काम मिलता रहेगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

जमीनी हकीकत: तकनीक की मार और रोजगार का संकट
बृंदा करात ने अपने पत्र में राजस्थान के उदयपुर जिले के बारापाला आदिवासी गांव का उदाहरण देते हुए तकनीकी खामियों को उजागर किया है। भीषण गर्मी के मौसम में सुबह 6:30 बजे से काम पर आई महिला मजदूर घंटों आधिकारिक ऑनलाइन अटेंडेंस पोर्टल खुलने का इंतजार करती रहीं, लेकिन नेटवर्क कनेक्टिविटी न होने के कारण अंततः उस दिन का काम रद्द करना पड़ा।
पत्र के अनुसार, संसद में दिए गए आश्वासनों के बावजूद इन मजदूरों को जनवरी से जून के बीच महज 18 दिन ही काम मिल सका है। यही नहीं, फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान प्रणाली) की तकनीकी अनिवार्यताओं के कारण कई बुजुर्ग महिलाओं को काम से बाहर होना पड़ा है क्योंकि उम्र के साथ आए शारीरिक बदलावों के चलते तकनीक ने उनकी आंखों को पहचानने से इनकार कर दिया।

संवैधानिक उल्लंघन और संघीय ढांचे पर चोट का आरोप

पत्र में 22 मई को जारी किए गए नियमों के सेट पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए गए हैं। करात ने पूछा है कि क्या ये नियम संविधान के अनुच्छेद 258 का उल्लंघन नहीं करते?
> संविधान का अनुच्छेद 258(3): जब केंद्र राज्यों पर वित्तीय या प्रशासनिक जिम्मेदारियां थोपता है, तो उसे राज्यों को वह अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च देना होता है जिस पर आपसी सहमति बनी हो या जिसे मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त मध्यस्थ तय करे।
> आरोप है कि वीबी-ग्रामजी कानून राज्यों से बिना किसी वास्तविक सलाह-मशविरे या सहमति के उन पर 40 प्रतिशत वित्तीय बोझ और प्रशासनिक उत्तरदायित्व डालता है, जबकि फैसले लेने की पूरी शक्ति केंद्र सरकार ने अपने हाथों में केंद्रित कर ली है।

फंड आवंटन के मानदंडों में विसंगतियां (नियम 396 ई)

नए नियमों के तहत फंड आवंटन को ‘मांग आधारित’ व्यवस्था से बदलकर ‘फंड आवंटन आधारित’ व्यवस्था में बदल दिया गया है। अब फंड का बंटवारा 16वें वित्त आयोग के मानदंडों के तहत प्रति व्यक्ति जीएसडीपी (GSDP) के अंतर और जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा।

राज्य – वर्तमान स्थिति और प्रभाव

🔸केरल: सालाना औसतन 66 दिन का काम (राष्ट्रीय औसत से अधिक), लेकिन कम आबादी के कारण नए नियमों में फंड से वंचित होने का खतरा।
🔸तमिलनाडु: सर्वाधिक सक्रिय मनरेगा मजदूरों वाले राज्यों में शामिल, लेकिन उच्च जीएसडीपी के कारण फंड आवंटन में नुकसान की आशंका।

विश्लेषण से स्पष्ट है कि इन मानदंडों का जमीन पर काम की वास्तविक मांग से कोई सीधा संबंध नहीं है। बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को ‘इनाम’ देने की नीति असल में गरीबों के काम के अधिकार को राज्य सरकारों की कार्यक्षमता का बंधक बना देगी।

ई-केवाईसी और मजदूरों की बेदखली का खतरा
नियम 397(ई) के तहत केवल ई-केवाईसी (e-KYC) और आधार से जुड़े जॉब कार्डों को ही मान्यता देने की बात कही गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के खुद के आंकड़े बताते हैं कि देश में केवल 56 प्रतिशत सक्रिय मजदूरों का ही ई-केवाईसी सत्यापन हो सका है। स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्टिविटी के अभाव में करीब 44 प्रतिशत सक्रिय मजदूर सीधे तौर पर काम पाने की कतार से बाहर हो जाएंगे।
इसके साथ ही, पीस-रेट (काम के आधार पर मजदूरी) के नियम इतने ऊंचे और मनमाने तय किए गए हैं कि हाथ से काम करने वाली महिला श्रमिकों के लिए बुनियादी न्यूनतम मजदूरी कमाना भी बेहद कठिन हो गया है।

नीतिगत समितियों से प्रभावित वर्ग और पंचायतें गायब
एक और बड़ी विसंगति राष्ट्रीय स्तर की संचालन समिति (NLSC) के गठन को लेकर है। इस केंद्रीय निकाय में राज्यों का प्रतिनिधित्व नाममात्र (केवल 5 राज्य) है। सबसे चौकाने वाली बात यह है कि ग्रामीण रोजगार में 18% आदिवासी, 17% दलित और 50% से अधिक महिलाएं शामिल हैं, लेकिन इस समिति में जनजातीय मामलों के मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
इसके अलावा, पारदर्शिता के लिए बेहद जरूरी ‘सोशल ऑडिट’ (सामाजिक अंकेक्षण) के लिए किसी स्वतंत्र प्राधिकरण का प्रावधान न करके इसे पूरी तरह सरकारी नौकरशाही के हवाले कर दिया गया है। स्थानीय स्वशासन की धुरी यानी पंचायतों के अधिकारों को भी इन नियमों में नजरअंदाज किया गया है।

यह मामला केवल एक राजनीतिक दल के विरोध या दो नेताओं के बीच पत्र-व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका की सुरक्षा से जुड़ा है। तकनीक का उपयोग पारदर्शिता बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि गरीबों को उनके हक से वंचित करने का जरिया बनने के लिए। यदि कोई भी नया कानून समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर खड़े व्यक्ति की जरूरतों के प्रति संवेदनशील नहीं है, तो विकास के बड़े दावों की प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। नीति निर्माताओं को नौकरशाही और जटिल तकनीकी चश्मे से इतर ग्रामीण भारत की वास्तविक व्यावहारिक चुनौतियों को समझते हुए इन नियमों पर तत्काल और समग्र पुनर्विचार करना चाहिए।

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