सांस्कृतिक संरक्षण के लिए बनी साझा रणनीति
कोरबा (आदिनिवासी)। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के गुमिया गांव में आदिवासी बियार समाज का एक दिवसीय प्रदेश स्तरीय सम्मेलन और भगवान बिरसा मुंडा शहादत दिवस गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ। इस आयोजन में न केवल बियार बल्कि गोंड समाज के प्रतिनिधियों ने भी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया, जिसे जमीनी स्तर पर आदिवासी एकजुटता के एक नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। इस समागम में समाज के उत्थान के लिए रूढ़िवादी रूढ़ियों से इतर शिक्षा, प्रशासनिक जागरूकता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर गंभीर मंथन हुआ।
परंपरा और पुरखा शक्तियों के आह्वान से शुरुआत
बिलासपुर संभाग के अंतर्गत आने वाले ग्राम गुमिया में ‘आदिवासी बियार जाति कल्याण सेवा समिति’ द्वारा इस भव्य कार्यक्रम का ताना-बाना बुना गया। आयोजन की शुरुआत आदिवासी लोक-परंपरा के अनुसार बड़ादेव और पुरखा शक्तियों की विशेष पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद स्वाधीनता आंदोलन के महानायक भगवान बिरसा मुंडा और भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के तैलचित्रों पर श्रद्धा-सुमन अर्पित किए गए। स्थानीय छात्राओं द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक स्वागत नृत्य ने आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों की याद दिला दी।

42 आदिवासी जातियों को एक सूत्र में पिरोने की वकालत
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आदिवासी शक्तिपीठ कोरबा के संस्थापक व संरक्षक और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (कुसमुंडा) के महाप्रबंधक श्री आर. एस. मार्को थे। उन्होंने अपने संबोधन में बियार समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए इसे देश का मूलनिवासी समाज बताया।
श्री मार्को ने सामाजिक बिखराव पर चिंता जताते हुए कहा:
“आज के दौर में सबसे बड़ी जरूरत यह है कि आदिवासी समाज की सभी 42 उप-जातियों को अपनी उप-पहचानों से ऊपर उठकर एक साझा और मजबूत मंच पर आना होगा। वैचारिक मतभेदों को भुलाकर जब तक हम संगठित नहीं होंगे, तब तक व्यवस्था में अपनी सही हिस्सेदारी तय नहीं कर पाएंगे।”
उन्होंने कोरबा में स्थापित आदिवासी शक्तिपीठ का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां विभिन्न आदिवासी समुदायों के देवी-देवताओं को एक ही स्थान पर सम्मान दिया गया है, ताकि यह क्षेत्र सर्व आदिवासी समाज की एकता और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत केंद्र बन सके।

प्रमुख उपस्थित सामाजिक नेतृत्व:
• डॉ. सुशीला संतोष नेताम (राष्ट्रीय अध्यक्ष, गोंडवाना गोंड महासभा महिला प्रभाग, नई दिल्ली)
• श्री मंत्री लाल काशी (प्रदेश संयोजक, छत्तीसगढ़ बियार समाज)
• श्री दीवान राम बियार (जिला अध्यक्ष, बियार समाज सूरजपुर)
• श्री केवल राम बियार (जिला अध्यक्ष, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर)
• श्री जगदीश चंद्र बियार (संभागीय अध्यक्ष, बिलासपुर)

युवा पीढ़ी, शिक्षा और सामाजिक संगठन
इस सम्मेलन का सबसे सकारात्मक पहलू यह रहा कि यहां केवल अतीत के गौरवगान पर चर्चा नहीं हुई, बल्कि भविष्य की चुनौतियों का व्यावहारिक खाका खींचा गया। वक्ताओं ने युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा को अपना मुख्य हथियार बनाएं। वक्ताओं का मानना था कि प्रशासनिक और सामाजिक चेतना के बिना कोई भी समाज मुख्यधारा में अपनी जगह नहीं बना सकता।
इस दौरान परसाही नाला के पूर्व सभापति परमेश्वर जगत, लाखन सिंह नेटी सहित गोंड और बियार समाज की मातृशक्ति ने भी अपने विचार रखे। बियार समाज के पदाधिकारियों द्वारा अतिथियों का पारंपरिक रूप से हल्दी-तिलक लगाकर आत्मीय स्वागत किया गया। यह पहला मौका था जब क्षेत्र में दो बड़े आदिवासी समाज (गोंड और बियार) इस तरह एक मंच पर पूरी एकजुटता के साथ नजर आए।

संगठन विस्तार के लिए जमीनी प्रयास
सामाजिक भागीदारी को सिर्फ भाषणों तक सीमित न रखकर इसे संगठनात्मक मजबूती देने का प्रयास भी किया गया। इसी कड़ी में ‘आदिवासी शक्तिपीठ’ के सदस्यता अभियान को आगे बढ़ाते हुए बियार समाज के प्रमुखों को सदस्यता रसीद पुस्तिकाएं (रसीद क्रमांक 1226 से 1325 तक) सौंपी गईं। इसका उद्देश्य ग्रामीण अंचलों में रहने वाले अंतिम व्यक्ति तक संगठन की पहुंच बनाना है। कार्यक्रम के समापन पर बिलासपुर संभाग के अध्यक्ष जगदीश चंद्र बियार ने सभी आगंतुकों और ग्रामीणों के प्रति आभार व्यक्त किया, जिसके बाद सामूहिक भोज के साथ इस समागम का समापन हुआ।

गुमिया का यह सम्मेलन महज एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में अपनी पहचान और अधिकारों के प्रति आदिवासी समाज की सजगता का प्रमाण है। गोंड और बियार समाज का एक साथ आना यह साफ संकेत देता है कि अब उप-जातियों की दीवारों को लांघकर वृहद आदिवासी एकता की जमीन तैयार की जा रही है। जब समाज के पढ़े-लिखे और प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग अपने सुदूर ग्रामीण सगाजनों के बीच आकर शिक्षा और संगठन की बात करते हैं, तो वह बदलाव की एक ठोस बुनियाद बनती है। आने वाले समय में यह वैचारिक एकजुटता इस अंचल के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर क्या असर डालती है, यह देखना बेहद अहम होगा।




