15 नवंबर: बिरसा मुंडा की जयंती मनायें और कॉरपोरेट पक्षधर वन संरक्षण नियम 2022 की प्रतियां जलायें

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नई दिल्ली (आदिनिवासी)। देश के सामाजिक संगठन नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए), जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच, अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (एआईकेएमएस), आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिनिवासी गण परिषद. अखिल भारतीय किसान महासभा, अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस), जागृत आदिवासी दलित संगठन (जेएडीएस), सत्यशोधक शेतकारी सभा महाराष्ट्र, मलकानगि जिला आदिवासी संघ, एआईकेएफ, तेलंगाना रायतांगा समिति, तेलंगाना गिरिजन संघम, इण्डियन नेशनलिस्ट मूवमेंट एवं अन्य कई संगठनों ने संयुक्त रूप से अपील जारी कर कहा है कि भारत सरकार वनों और वन भूमि को बड़े कारपोरेट्स और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने के लिए वन भूमि के विशाल क्षेत्रों से आदिवासियों और अन्य वन्यजीवी समुदायों को उखाड़ फेंकने और विस्थापित करने के लिए एक और हिंसक हमला शुरू करने की तैयारी कर रही है. इसके लिए उसने वन संरक्षण नियम 2022 को संसद के सामने रखा है. यह संभावना है कि ये बजट सत्र 2023 के दौरान अनुमोदित हो जाएंगे.

हमें पहले की तरह वापस लड़ना चाहिए

ब्रिटिश विरोधी संघर्ष के महान नायक बिरसा मुंडा की जयंती नजदीक आ रही है. उनका जन्म 15 नवंबर, 1875 को झारखंड के लोहरदगा जिले के उलिहातु गांव में हुआ था. मुंडा विद्रोह औपनिवेशिक सत्ता और स्थानीय अधिकारियों द्वारा ‘अनुचित भूमि हथियाने की प्रथाओं’ के खिलाफ था, जिसने आदिवासी पारंपरिक भूमि व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था. इसका मुख्य नारा था ‘अबुआ राज एते जाना महारानी राज टुंडू जाना’ अर्थात ‘रानी का राज्य समाप्त हो और हमारा राज्य स्थापित हो’.

1899 के क्रिसमस के आसपास लगभग 7000 पुरुष और महिलाएं इकट्ठे हुए थे और उन्होंने ‘उलगुलान’ क्रांति शुरू करने के लिए मार्च किया जो जल्द ही खूंटी, तमार, बसिया और रांची में फैल गया. अंग्रेजों के 4 से अधिक पुलिस थानों पर हमला किया गया. यह बिरसा और 460 से अधिक आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारी और अभियोजन में समाप्त हुआ. बिरसा की 9 जून 1900 को कुछ अन्य साथियों के साथ, जेल में मृत्यु हो गई.

कंपनी राज से आजादी के लिए हमारे संघर्ष के इन नायकों की याद में, आइए हम इन वन संरक्षण नियम 2022 की प्रतियां जलाएं और इस साल 15 नवंबर को पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करें.

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