बुधवार, जनवरी 21, 2026

छत्तीसगढ़ में आदिवासी अस्मिता पर चौतरफा हमला: जमीन, धर्म और राजनीति में वजूद की लड़ाई

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छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड महासभा ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को ज्ञापन सौंपकर तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई

🎖️गैर-आदिवासी बेनामी लेनदेन और आदिवासी महिलाओं से विवाह कर जमीनें हड़प रहे हैं।

🎖️आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भी आदिवासी महिलाओं से विवाह एक जरिया बन गया है।

🎖️आदिवासी समुदाय जनगणना में अपने अलग धर्म कोड की कर रहा है मांग।

रायपुर (आदिनिवासी)। छत्तीसगढ़ के आदिवासी आज अपने जल, जंगल, जमीन और पहचान को बचाने के लिए एक मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं। गैर-आदिवासियों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों की जमीनें हड़पने, विवाह के माध्यम से उनके राजनीतिक अधिकारों का हनन करने और उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान को मान्यता न देने जैसे गंभीर मुद्दों ने समुदाय को अपने ही घर में पराया महसूस करने पर मजबूर कर दिया है। इन ज्वलंत समस्याओं को लेकर छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड महासभा ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का दरवाजा खटखटाया है और तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

महासभा के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रमेश चंद्र श्याम द्वारा आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में उन तरीकों का खुलासा किया गया है जिनसे आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।

जमीन पर कब्जा: बेनामी लेनदेन और विवाह का जाल

आदिवासी भूमि पर कब्जे का खेल बड़ी चालाकी से खेला जा रहा है। ज्ञापन के अनुसार, गैर-आदिवासी पहले किसी आदिवासी व्यक्ति के नाम पर बेनामी संपत्ति के रूप में जमीन खरीदते हैं। बाद में, जिला कलेक्टर की अनुमति से वही जमीन (बेनामीदार) आदिवासी द्वारा (लाभार्थी स्वामी) गैर-आदिवासी को बेच दी जाती है। इस प्रक्रिया में बेनामी (निषेध) अधिनियम के तहत दर्ज आपत्तियों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में लीज के बहाने जमीन पर कब्जा करना एक आम बात हो गई है, जहाँ मामूली रकम देकर स्थायी ढांचे बना लिए जाते हैं।

दूसरा बड़ा तरीका आदिवासी महिलाओं से विवाह करना है। गैर-आदिवासी पुरुष आदिवासी महिला से शादी करके उसकी पत्नी के नाम पर जमीन खरीदते हैं। पत्नी की मृत्यु के बाद, जमीन का मालिकाना हक या तो बच्चों या सीधे गैर-आदिवासी पति को मिल जाता है। यह प्रवृत्ति न केवल भूमि कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि यह आदिवासी समाज के सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करती है।

महासभा ने सुझाव दिया है कि जिला कलेक्टर को भूमि हस्तांतरण की अनुमति देने से पहले यह प्रमाणित करना अनिवार्य किया जाए कि इसमें बेनामी लेनदेन अधिनियम और छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता का उल्लंघन नहीं हुआ है। साथ ही, विवाह के माध्यम से भूमि हस्तांतरण के मामलों में राजस्व अधिकारियों के लिए कड़े और स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई है।

राजनीतिक अधिकारों का हनन

भूमि के अलावा, आदिवासियों के राजनीतिक अधिकार भी दांव पर हैं। ज्ञापन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि गैर-आदिवासी पुरुष आदिवासी महिलाओं से विवाह करके अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर अपनी पत्नियों के नाम से चुनाव लड़ रहे हैं। बस्तर क्षेत्र में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां बांग्लादेशी शरणार्थियों द्वारा आदिवासी पंचायतों का संचालन किया जा रहा है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। महासभा ने इस तरह के शोषण को रोकने के लिए उचित विधायी उपाय करने की मांग की है।

पहचान का संकट: अलग धर्म कोड की मांग

आदिवासियों की एक बड़ी पीड़ा अपनी धार्मिक पहचान को लेकर है। उनकी मान्यताएं और पूजा-पद्धति हिंदू, इस्लाम या ईसाई धर्म से अलग, प्रकृति पर आधारित होती हैं। इसके बावजूद, जनगणना फॉर्म में उनके धर्म के लिए कोई अलग कॉलम नहीं है, जिससे उन्हें “अन्य” श्रेणी चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 1951 की जनगणना के बाद से आदिवासियों को अलग से गिनना बंद कर दिया गया, जबकि उससे पहले ब्रिटिश काल में भी उनके लिए अलग धार्मिक श्रेणी होती थी।

छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्यों के आदिवासी समुदाय लंबे समय से जनगणना में एक अलग आदिवासी धर्म कोड को शामिल करने की मांग कर रहे हैं ताकि उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को आधिकारिक मान्यता मिल सके।

जब कब्रगाह भी सुरक्षित नहीं

इन बड़े मुद्दों के बीच, जमीनी स्तर पर आदिवासियों की पीड़ा का एक उदाहरण बिल्हा तहसील के उमरिया गांव में देखने को मिलता है। यहां गोंड जनजाति के पारंपरिक कब्रिस्तान पर गैर-आदिवासियों ने अतिक्रमण कर लिया है और उस जमीन का उपयोग आवासीय और कृषि कार्यों के लिए किया जा रहा है। इसके कारण गांव के आदिवासियों को अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। इस समस्या के समाधान के लिए दिया गया आवेदन लंबे समय से तहसीलदार के पास लंबित है, जो प्रशासनिक उदासीनता को भी उजागर करता है।

“छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड महासभा की यह अपील सिर्फ एक ज्ञापन नहीं, बल्कि राज्य के आदिवासी समाज के अस्तित्व, स्वाभिमान और संवैधानिक अधिकारों को बचाने की एक दर्दभरी गुहार है। अब गेंद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और ‘आदिवासी मुख्यमंत्री’ वाली छत्तीसगढ़ सरकार के पाले में है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आदिवासियों के इन गंभीर मुद्दों पर वे नींद से जागते हैं या फिर से कुंभकर्णी नींद के आगोश में दुबक कर सो जाते हैं।”

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