शुक्रवार, जून 21, 2024

तुम्हारी जाति क्या है? आईआईटी में सबसे पहला सवाल: कब सुधरेगा सिस्टम?

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लोकसभा के हालिया शीत सत्र में पेश आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा 05 सितंबर 2021 से 05 सितंबर 2022 के बीच आरक्षित पदों पर नियुक्तियों के अभियान चलाये जाने के शोर-शराबे के बावजूद आईआईटी संस्थानों में आरक्षित श्रेणी के मात्र लगभग 30 प्रतिशत पद भरे जा सके हैं।

आईआईटी रुड़की में 62 प्रतिशत, आईआईटी बॉम्बे में 53 प्रतिशत और आईआईटी गांधीनगर में 34 प्रतिशत आरक्षित श्रेणी के पद अभी भी खाली हैं। आईआईटी मद्रास के इस श्रेणी के 44 खाली पदों में से 29 भरे गये, जबकि 25 अभी भी खाली हैं।
तुम्हारी जेईई की रैंक क्या है? ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान’, यानि आईआईटी में यह पहला सवाल है, जो छात्रावास में आपके रूम-पार्टनर द्वारा, पहली कक्षा के पहले की घबराहट के बीच या कैंटीन में पहली कॉफी की टेबल पर, कहीं से भी दागा जा सकता है। देखने में परिचय बढ़ाने के लिए किया गया यह मासूम सवाल सा दिख सकता है, लेकिन आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए इसके पीछे छिपा हुआ भाव होता है, कि ‘तुम्हारी जाति क्या है?’

आईआईटी-बॉम्बे के मकैनिकल इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष के छात्र दर्शन सिंह सोलंकी की गत फरवरी में आत्महत्या के कारणों की जांच कर रही 12 सदस्यीय टीम ने निष्कर्ष निकाला है कि उसकी आत्महत्या के पीछे जातीय भेदभाव का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है और संभव है कि खराब परीक्षा परिणामों के चलते उसने ऐसा क़दम उठाया हो।
दर्शन ने हॉस्टल-16 की सातवीं मंजिल से कूद कर अपनी जान दे दी थी। समिति के निष्कर्षों को खारिज करते हुए उसके पिता ने निदेशक को पत्र लिखा कि, “यह किस तरह का संस्थान है जो अनुसूचित जातियों/जनजातियों के छात्रों को सुरक्षित और अच्छी परवरिश के लायक माहौल देने के अपने वायदों को निभाने की जगह उनके द्वारा झेली जा रही तकलीफों के लिए खुद उन्हें ही गुनहगार ठहराता है?”

लेकिन सच्चाई यही है कि इन संस्थानों के परिसरों में पहले क़दम से ही जाति अपने पांव पसारना शुरू कर देती है और वही आगे चल कर इन छात्रों के आत्मसम्मान के साथ-साथ शैक्षणिक परिणामों को भी कमजोर करती जाती है।
ज्यादातर छात्र जेईई की तैयारी के दौरान यही सोचते हैं कि एक बार दाखिला मिल जाए तो जिंदग़ी पटरी पर आ जाएगी। इसीलिए दाखिले के बाद वे उन सभी पाठ्येतर गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर देते हैं, जो तैयारी के समय छूट गयी रहती हैं। संतुलन बना कर फिर से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में थोड़ा समय लग जाता है।

इसी वजह से पहला वर्ष लगभग सभी छात्रों के लिए भारी साबित होता है। लेकिन कमजोर पृष्ठभूमि से आये छात्रों के लिए तो यह विशेष तौर पर मुश्किल होता है, क्योंकि वे इसके साथ ही साथ अंग्रेजी पर पकड़ और संसाधनों की कमी से भी जूझ रहे होते हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आये वे बच्चे जो जेईई की परीक्षा हिंदी माध्यम से पास करके आये होते हैं, उन्हें भी यहां पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में ही करनी होती है।
अंग्रेजी के लिए दिया जाने वाला अतिरिक्त प्रशिक्षण भी शुरुआती दिनों में ज्यादा कारगर नहीं साबित होता। कुछ बच्चों को यही समझने में अच्छा खासा समय निकल जाता है कि प्रोफेसर द्वारा पढ़ाई जाने वाली ‘पोटेंशियल एनर्जी’ तो दरअसल ‘स्थितिज ऊर्जा’ ही है। अंग्रेजी में जवाब देने में हिचक और अपने सहपाठियों की हंसी के डर से कई बच्चे वाइवा ही छोड़ देते हैं।

कई ऐसे छात्र जो अपने स्कूलों में टॉपर रहे होते हैं, यहां आकर सबसे नीचे हो जाते हैं। कई बार उनको ‘एफआर’ (फेल एंड रिपीट) ग्रेड मिल जाते हैं। ऐसे शुरुआती झटके ही कई छात्रों को तबाह करने के लिए काफी होते हैं।
आरक्षित श्रेणी के प्रथम वर्ष के छात्र आरक्षण संबंधी टिप्पणियों और कटाक्षों के सामने अक्सर असहाय और रक्षात्मक महसूस करने लगते हैं, क्योंकि इस समय वे खुद ही कई मोर्चों पर संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं और इस प्रश्न पर विचार करने की स्थिति में नहीं होते।

ऐसे कटाक्ष उनके आत्मविश्वास को और ज्यादा कमजोर कर देते हैं। जबकि प्रथम वर्ष के झंझावात से निकल जाने के बाद यही छात्र आरक्षण की जरूरत और औचित्य पर बेहतर ढंग से बहस करने में सक्षम हो जाते हैं।
दर्शन सोलंकी केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे। आईआईटी की व्यवस्था के मुताबिक इन छात्रों को रूम पार्टनर कंप्यूटर साइंस जैसी टॉप 500 रैंकिंग की मांग वाली शाखाओं के छात्र मिलते हैं। अपने खराब स्कोर और ‘फेल एंड रिपीट’ ग्रेडिंग के साथ ऐसे छात्रों के बीच रहना ज्यादा अवसाद पैदा करता है।

हलांकि अब अलग-अलग शाखाओं और पृष्ठभूमियों के छात्रों के बीच मेल-मिलाप विकसित करने के लिए कमरों के आवंटन का आधार बदल दिया गया है। अब एक कमरे में एक छात्र सामान्य वर्ग का और दूसरा आरक्षित वर्ग का रखा जाने लगा है।
आईआईटी में रैंक और मेरिट पर ज्यादा जोर हाशिये के समाजों से आये हुए छात्रों को किनारे ढकेलता रहता है। ऐसा नहीं है कि इनमें प्रतिभा का अभाव है, आखिर ये जेईई पास करके आईआईटी में प्रवेश लिये होते हैं। समुचित मार्गदर्शन और सलाह से वंचित ये बच्चे कक्षाओं के भीतर भी और बाहर भी संघर्ष को अभिशप्त हो जाते हैं।

रैंक और मेरिट पर जोर देने वाले प्रोफेसरों का नजरिया और रवैया भी इन छात्रों का मनोबल तोड़ने वाला होता है। वे अक्सर इस बात का उल्लेख करते रहते हैं कि “आरक्षण के कारण आईआईटी में आने वाले छात्रों की गुणवत्ता में गिरावट आई है।” या कैसे “भारत आरक्षण के कारण संघर्ष कर रहा है।”
दरअसल ऐसे संस्थानों ने मजबूरी में अपने यहां आरक्षण लागू तो कर दिया, लेकिन इसके अनुकूल शिक्षण तकनीकें, मूल्यांकन पद्धति और प्रशासनिक उपाय विकसित करने के काम में या तो असमर्थ रहे अथवा अनिच्छुक बने रहे। इसका खामियाजा यह हुआ कि इनकी पूरी प्रणाली मेरिट और उत्कृष्टता पर जोर देने वाली बनी रही।

इसका हश्र अनिवार्यतः यही होना था कि आरक्षण लागू करने के बावजूद आरक्षित वर्गों के छात्रों में मेरिट की कमी बताते हुए पूरी व्यवस्था अपनी सोच के स्तर पर आरक्षण के प्रावधान के खिलाफ खड़ी हो जाती। यही हुआ भी।
संस्थान ने जाति आधारित भेदभाव से बचने-बचाने तथा परिसरों को ज्यादा समावेशी बनाने के लिए अपनी तरफ से कई उपाय किये हैं। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी भी दस्तावेज़ में जेईई रैंकिंग का उल्लेख नहीं किया जाना, जाति के मुद्दों पर छात्रों में संवदनशीलता विकसित करने के लिए अनुकूलन सत्रों का आयोजन, आरक्षित वर्गों के छात्रों की शिकायतों को सुनने और समाधान करने के लिए मंच और सरकारी निर्देश के अनुसार अनुसूचित जातियों/जनजातियों के छात्रों के लिए सलाहकार उपलब्ध कराना।

2014 में आईआईटी बॉम्बे के बीटेक के चौथे साल के छात्र अनिकेत अंभोरे की आत्महत्या के बाद ‘ए के सुरेश समिति’ की संस्तुति पर वहां एससी-एसटी सेल का गठन किया गया। हालांकि यह गठन भी 2017 में हो पाया, फिर भी 2022 तक भी इस सेल को कोई ऑफिस नहीं मुहैया कराया गया। अभी भी हालत यह है कि इस सेल को कोई अधिकार-पत्र नहीं सौंपा गया है, जिसके अभाव में यह सेल एससी-एसटी मामलों में हाथ ही नहीं डाल सकता।
यहां तक कि यह सेल ऐसे फैकल्टी सदस्यों द्वारा चलाया जा रहा है, जो खुद एससी-एसटी समुदाय के नहीं हैं। संस्थान के मानसिक स्वास्थ्य सेवा में एक भी सलाहकार एससी-एसटी समुदाय का नहीं है। ऐसे सलाहकार अक्सर खुद ही कमजोर वर्गों की समस्याओं को समझने में असमर्थ होते हैं।

जाति के सवाल पर संवेदनशीलता विकसित करने के लिए पिछले साल एक ऐसा पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा की गयी थी जो सभी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए अनिवार्य होगा, लेकिन वह पाठ्यक्रम अभी तक तैयार भी नहीं हुआ है। संस्थान द्वारा किये गये उपायों की जमीनी हक़ीक़त यही है।
पिछले साल इस सेल ने एक सर्वेक्षण करके बताया कि आरक्षित वर्गों के छात्रों की मानसिक समस्याओं में परिसर में होने वाला जातीय भेदभाव केंद्रीय कारण है। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लगभग एक चौथाई छात्र मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित थे, जबकि 7.5 प्रतिशत छात्र खुद को नुकसान पहंचा सकने वाली गंभीर मानसिक समस्याओं से ग्रस्त मिले।

कुछ छात्रों का मानना है कि जिस तरह से रैगिंग और छेड़खानी को अपराध घोषित किया गया, उसी तरह रैंक पूछने को भी अपराध घोषित करने जैसे बड़े क़दम उठाने की जरूरत है। भेदभाव की समस्याओं के निराकरण के सांस्थानिक प्रयासों में ऐसे प्रोफेसरों को ही शामिल किया जाना चाहिए जो हाशिये की पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के प्रति स्वयं भी संवेदनशील हों और जो खुलेआम मेरिट की वकालत करने वाले न हों।

दरअसल, कमजोर वर्गों से आने वाले छात्रों के सशक्तीकरण से भी ज्यादा जरूरी है सामान्य वर्गों के छात्रों और प्रोफेसरों को जागरूक करना और उन्हें जाति के प्रश्न पर संवेदनशील बनाना। इसका सबसे आवश्यक पहलू है कि आईआईटी के शिक्षकों, कर्मचारियों और कार्यालयों में कमजोर वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़े और वे समावेशी हों।
लोकसभा के हालिया शीत सत्र में पेश आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा 5 सितंबर 2021 से 5 सितंबर 2022 के बीच आरक्षित पदों पर नियुक्तियों के अभियान चलाये जाने के शोर-शराबे के बावजूद आईआईटी संस्थानों में आरक्षित श्रेणी के मात्र लगभग 30 प्रतिशत पद भरे जा सके हैं।

आईआईटी रुड़की में 62%, आईआईटी बॉम्बे में 53% और आईआईटी गांधीनगर में 34% आरक्षित श्रेणी के पद अभी भी खाली हैं। आईआईटी मद्रास के इस श्रेणी के 44 खाली पदों में से 29 भरे गये, जबकि 25 अभी भी खाली हैं।

आईआईटी संस्थानों के परिसर भी भारतीय समाज का ही आईना हैं। इसलिए संस्थानों द्वारा अपने परिसरों में जातीय भेदभाव के अस्तित्व को नकारना व्यर्थ है। बेहतर है कि वे अपने यहां आरक्षित श्रेणी के खाली पदों को शीघ्र भरें और भेदभाव के खात्मे के लिए घोषित क़दमों को अमली जामा पहनाएं।
(आलेख : शैलेश)
(शैलेश स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, लेख ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में पल्लवी स्मार्ट की रिपोर्ट पर आधारित) (Credits: Jan Chowk)


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