कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर के बीचों-बीच एक 100 बिस्तरों वाले मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल का उद्घाटन बड़े धूमधाम और शान-ओ-शौकत के साथ हो गया – बैनर लगे, नेता आए, तालियाँ बजीं – लेकिन जिस बात की किसी ने खबर नहीं ली, वह यह थी कि इस अस्पताल के पास अभी तक संचालन का वैध लाइसेंस ही नहीं है। शिवाय फैमिली द्वारा ट्रांसपोर्ट नगर में संचालित इस अस्पताल को नर्सिंग होम एक्ट के तहत अब तक कोई लाइसेंस जारी नहीं किया गया है – और इसकी जानकारी अंधेरे में रखकर राज्य के एक कैबिनेट मंत्री से उद्घाटन करा लिया गया।
#मंत्री ने किया उद्घाटन, स्वास्थ्य मंत्री ने बनाई दूरी
उद्घाटन समारोह में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। लेकिन आखिरी वक्त पर उन्होंने किसी कारण का हवाला देकर कार्यक्रम में आने से इनकार कर दिया। यह संयोग था या सावधानी – यह तो वक्त बताएगा। उद्घाटन से पहले अस्पताल के संचालकों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की, लेकिन पत्रकारों को आधी-अधूरी जानकारी ही दी गई। लाइसेंस के बारे में कोई उल्लेख नहीं हुआ।
## कितने लाइसेंस चाहिए एक बड़े हॉस्पिटल को?
किसी भी बड़े और सर्वसुविधायुक्त अस्पताल को चलाने के लिए कई विभागों से अनुमति लेनी पड़ती है। जानकारों के अनुसार इनमें प्रमुख हैं:-
– क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत अस्पताल का अनिवार्य पंजीयन
– राज्य स्वास्थ्य विभाग की अनुमति
– नगर निगम से भवन नक्शा, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से लैंड यूज़ अप्रूवल
– फायर एंड सेफ्टी की एनओसी
– पर्यावरण विभाग से बायोमेडिकल वेस्ट निपटान की एनओसी
– फार्मेसी के लिए CDSCO का लाइसेंस
– CT स्कैन और X-Ray के लिए एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) का लाइसेंस – ताकि खतरनाक विकिरणों से लोगों की सुरक्षा हो सके
– GST पंजीयन और नगर निगम का ट्रेड लाइसेंस
– यदि लिफ्ट है, तो लिफ्ट लाइसेंस
– इलेक्ट्रिकल सेफ्टी, वाटर सप्लाई और सीवरेज की अनुमति
– सभी डॉक्टरों का केंद्र या राज्य मेडिकल काउंसिल में पंजीयन
इतने सारे नियम-कायदों के बावजूद शिवाय हॉस्पिटल बिना वैध लाइसेंस के चालू हो गया – और कोई रोकने वाला नहीं था।
## CMO ने माना – लाइसेंस अभी जारी नहीं हुआ
जब मीडिया ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी एस.एन. केसरी से इस बारे में बात की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि शिवाय हॉस्पिटल की ओर से ऑनलाइन लाइसेंस का आवेदन किया गया है, लेकिन अभी तक लाइसेंस जारी नहीं हुआ है। यह स्वीकारोक्ति खुद ही कई सवालों को जन्म देती है – जब लाइसेंस नहीं था, तो उद्घाटन की अनुमति कैसे मिली? और अगर विभाग को पता था, तो चुप क्यों रहा?
## सबसे बड़ा खतरा: बस स्टैंड के अंदर है अस्पताल का मुख्य द्वार
इस पूरे मामले में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। शिवाय हॉस्पिटल का मुख्य द्वार सीधे शहर के भीड़भाड़ वाले अंतर्राज्यीय बस स्टैंड के अंदर स्थित है।
जरा सोचिए – किसी मरीज़ को दिल का दौरा पड़ा हो, या कोई गंभीर दुर्घटना हुई हो, और एम्बुलेंस को अस्पताल तक पहुँचना हो – लेकिन बस स्टैंड की भीड़ में न तो एम्बुलेंस के लिए जगह है, न पार्किंग। आग लगने की स्थिति में फायर ब्रिगेड की गाड़ी भवन के चारों तरफ कैसे घूमेगी? यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, यह लोगों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है।
नियमों के अनुसार किसी भी मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के चारों ओर पर्याप्त खुली जगह होनी चाहिए। यहाँ वह बुनियादी शर्त भी पूरी नहीं होती – फिर भी अनुमति कैसे मिली?
## पुराने घावों पर नया नमक – शहर में ऐसे कई अस्पताल**
दुखद सच यह है कि शिवाय कोई अकेला मामला नहीं है। कोरबा में ऐसे कई निजी अस्पताल हैं जो तंग और संकरी जगहों पर धड़ल्ले से चल रहे हैं – बिना चारों तरफ एक्सेस के, बिना पर्याप्त सुरक्षा प्रबंधों के। पिछले वर्षों में कई बार खामियाँ सामने आईं, जाँच की बात हुई – लेकिन न जाँच का नतीजा सामने आया, न किसी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। जनता के लिए यह एक ऐसा सिलसिला बन गया है जो कभी खत्म नहीं होता।
## **आम आदमी का सवाल – उनका हक है जानना
इलाज के नाम पर जेब खाली करने वाले आम नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जिस अस्पताल में वे अपने बच्चे, अपने माँ-बाप, अपने प्रियजनों को लेकर जाते हैं – क्या वह अस्पताल कानूनी रूप से वैध है? क्या वहाँ उनकी सुरक्षा के लिए ज़रूरी इंतज़ाम हैं? सुविधाओं के नाम पर जो मोटी फीस ली जा रही है, क्या उसके एवज में मरीज़ को वैध और सुरक्षित उपचार मिल रहा है?
अब गेंद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के उच्च अधिकारियों के पाले में है। सवाल साफ है – स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर खुलेआम नियमों को ताक पर रखने वाले संचालकों के खिलाफ कब और कैसी कार्रवाई होगी?
जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक इस शहर का हर वह मरीज़ खतरे में है जो इलाज की उम्मीद लेकर किसी अस्पताल के दरवाज़े पर दस्तक देता है।




