सत्ता, कॉर्पोरेट और जांच एजेंसियों का त्रिकोण: वेदांता समूह पर ED ‘एक्शन’ के क्या हैं मायने?

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कॉर्पोरेट जगत और सत्ता के गलियारों का रिश्ता हमेशा से ही ‘शह और मात’ के खेल जैसा रहा है। हाल के दिनों में वेदांता समूह के सुप्रीमो अनिल अग्रवाल के संस्थानों पर जांच एजेंसियों की सक्रियता ने देश के राजनीतिक और आर्थिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कभी सत्ता के बेहद करीब माने जाने वाले उद्योगपति के ठिकानों पर अचानक इस तरह की कार्रवाई क्या वाकई संबंधों में आई खटास का नतीजा है, या इसके पीछे कोई गहरा रणनीतिक खेल है?
इस जटिल विषय को समझने के लिए हमें इसे किसी एक नजरिए से नहीं, बल्कि देश के आर्थिक, राजनीतिक, कॉर्पोरेट, श्रम और सामाजिक (आदिवासी) ताने-बाने के विभिन्न कोणों से देखना होगा।

2 जून 2026 की सुबह दिल्ली और मुंबई में एक साथ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीमें वेदांता ग्रुप के दफ्तरों में घुसीं। विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के कथित उल्लंघन की जाँच के तहत यह ताबड़तोड़ छापेमारी की गई।
राजस्थान सहित कई शहरों में एक साथ हुई इस कार्रवाई का केंद्र वह रॉयल्टी भुगतान था जो वेदांता लिमिटेड, अपनी ब्रिटेन स्थित मूल कंपनी वेदांता रिसोर्सेज को करती आ रही थी।

कौन ‘खासमखास’ है और कब तक?

भारत की राजनीति में कॉर्पोरेट घरानों और सत्तारूढ़ दल के रिश्ते हमेशा “सुविधा की शादी” रहे हैं – जब तक दोनों पक्षों को फ़ायदा हो, प्रेम अटूट; जैसे ही आपसी हित टकराएं, तो फिर तलाक़ तय।
1990 के दशक के अंत में अनिल अग्रवाल ने बीजेपी नेताओं अरुण शौरी और प्रमोद महाजन से घनिष्ठ संबंध स्थापित किए, जिन्होंने भारत के पहले रणनीतिक विनिवेश की राह खोली। उन्हीं के कार्यकाल में 2001 में BALCO को स्टरलाइट को बेचा गया – और यह सौदा न तो पारदर्शी था, न ही उचित मूल्यांकन पर आधारित। यही वह नींव थी जिस पर वेदांता का साम्राज्य खड़ा हुआ।

इसके बाद के दशकों में यह रिश्ता और मज़बूत होता गया। वेदांता लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2024-25 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को लगभग 97 करोड़ रुपये का दान दिया – जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग चार गुना वृद्धि थी।
पिछले पाँच वर्षों में वेदांता ने इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों को कुल 457 करोड़ रुपये दिए।
यह आँकड़ा बताता है कि यह सिर्फ दान नहीं, एक रणनीतिक निवेश था – सत्ता की “बीमा पॉलिसी”।

लेकिन मई 2026 में एक दिलचस्प घटनाक्रम हुआ। अनिल अग्रवाल ने पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी की जीत पर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को बधाई देते हुए “विकसित भारत” के उनके संकल्प को जनादेश बताया।
यह बधाई संदेश आया – और महज कुछ हफ्तों बाद ED की टीमें वेदांता के दरवाज़े पर थीं। राजनीति में इस तरह के “संयोगों” को महज़ इत्तेफ़ाक नहीं माना जाता।

प्रश्न यह है कि ED, जो वर्षों से विपक्षी नेताओं और “अनमित” कॉर्पोरेट घरानों पर शिकंजा कसती रही है, अचानक अपने सबसे बड़े “दानदाता” के दरवाज़े पर क्यों पहुँची? क्या यह वेदांता के डीमर्जर प्रक्रिया से उपजे किसी आंतरिक असंतोष का संकेत है? क्या सत्ता के गलियारों में हुई किसी नीतिगत असहमति की यह सज़ा है? या फिर यह उस पुराने खेल का नया अध्याय है – जहाँ “खासमखास” का दर्जा स्थायी नहीं होता?

रॉयल्टी का खेल और विदेशी धन का प्रवाह

ED की जाँच का केंद्र वह तरीका है जिससे वेदांता लिमिटेड और उसकी ब्रिटेन स्थित मूल कंपनी वेदांता रिसोर्सेज के बीच धन का प्रवाह होता रहा है।
यह कोई नई बात नहीं – यह संरचना वर्षों से विशेषज्ञों के निशाने पर रही है।

वेदांता की कारोबारी संरचना को समझना ज़रूरी है। भारत की ज़मीन से निकलने वाले खनिज – जस्ता, एल्युमिनियम, लोहा, तेल-गैस – भारतीय श्रमिकों और समुदायों की क़ीमत पर निकाले जाते हैं। लेकिन इनसे होने वाले मुनाफे का बड़ा हिस्सा “रॉयल्टी” और “मैनेजमेंट फी” के नाम पर लंदन स्थित मूल कंपनी को भेजा जाता है। जुलाई 2025 में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर Viceroy Research ने आरोप लगाया था कि वेदांता ग्रुप अपनी भारतीय इकाई को “निचोड़” रहा है – मुनाफे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है और लेनदारों को गंभीर जोखिम में डाला जा रहा है।

वेदांता प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी जाँचकर्ताओं के साथ पूरा सहयोग कर रही है और सभी माँगी गई जानकारी प्रदान कर रही है।
लेकिन इस “सहयोग” के बावजूद ED की कार्रवाई की खबर आते ही शेयर बाज़ार में वेदांता के शेयरों में गिरावट दर्ज हुई।

एक और महत्वपूर्ण तथ्य – अनिल अग्रवाल के अनुसार, वेदांता का डीमर्जर प्रक्रिया के तहत एल्युमिनियम, तेल-गैस, बिजली और इस्पात के लिए अलग-अलग कंपनियाँ बनाई जाएँगी और लिस्टिंग होगी।
इस बड़े पुनर्गठन के ऐन वक्त पर ED की छापेमारी – यह निवेशकों और बाज़ार के लिए एक बड़ा संदेश है।

श्रम संगठनों की नज़र से: मज़दूर की लाश पर खड़ा महल

जब भी वेदांता-BALCO पर चर्चा होती है, तो एक सच्चाई को हमेशा दरकिनार कर दिया जाता है – इस साम्राज्य की नींव में मज़दूरों का खून और पसीना है।
कोरबा के BALCO संयंत्र में कार्यरत और सेवानिवृत्त श्रमिकों की दशकों की पीड़ा किसी से छुपी नहीं। सक्ती बॉयलर विस्फोट हो, निर्माण स्थलों पर असुरक्षित हालात हों, या सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया मेडिकल लाभ और पेंशन विसंगतियाँ – हर मोर्चे पर मज़दूर ठगा गया है।

जब वेदांता सैकड़ों करोड़ रुपये रॉयल्टी के नाम पर विदेश भेजती है, तो उसी वेदांता के संयंत्रों में ठेका मज़दूर न्यूनतम मज़दूरी और अपने अधिकारों के लिए तरसते हैं। जब कंपनी राजनीतिक दलों को 97 करोड़ का चंदा देती है, तो उसी कंपनी के सेवानिवृत्त कर्मचारी अपने चिकित्सा सुविधा और भत्ते के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शरण लेने को मजबूर हो जाते हैं।
यह ED की छापेमारी मज़दूर आंदोलन के लिए एक नैतिक सबक है – इतने बड़े-बड़े राजनीतिक संबंध भी आखिरकार काम नहीं आते। लेकिन साथ ही यह एक कड़वा सच भी है: जब तक यह जाँच सिर्फ FEMA उल्लंघन तक सीमित रहे और मज़दूरों के शोषण, अनुबंध उल्लंघन और औद्योगिक सुरक्षा अपराधों तक न पहुँचे – तब तक यह “न्याय” नहीं, सत्ता का आंतरिक झगड़ा ही रहेगा।

हर एक श्रमिक संगठन को एकजुट होकर माँग करनी चाहिए कि ED की जाँच का दायरा बढ़े – BALCO में हुई दुर्घटनाओं, सुरक्षा मानकों के उल्लंघन, और श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने के मामलों की भी जाँच हो।

आदिवासी समुदाय की नज़र से: ज़मीन गई, जंगल गया, अब न्याय कब?

वेदांता पर पर्यावरण और समुदाय से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं – ओडिशा में खनन कार्यों से जुड़े आरोप और औद्योगिक संयंत्रों में प्रदूषण की चिंताएँ अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और पर्यावरण संगठनों तक पहुँचती रही हैं।
ओडिशा का नियामगिरि आंदोलन – जहाँ डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय ने वेदांता के बॉक्साइट खनन के खिलाफ वर्षों संघर्ष किया और अंततः 2013 में ग्रामसभाओं ने सर्वसम्मति से खनन को नकार दिया – यह भारत के आदिवासी प्रतिरोध का सबसे शानदार अध्याय है। लेकिन उस जीत के बाद भी देश के अन्य हिस्सों में, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक, आदिवासी ज़मीनें खनन के नाम पर हथियाई जाती रही हैं।
कोरबा के आदिवासी समुदाय जानते हैं कि BALCO के नाम पर उनकी पुश्तैनी ज़मीन छिनी, उनके जंगल उजाड़े गए, उनकी नदियाँ प्रदूषित हुईं। और बदले में मिला क्या? अस्थाई रोज़गार, विस्थापन का दर्द, और खोखले मुआवजे के वादे।

आज जब ED वेदांता के दरवाज़े खटखटाती है, तो आदिवासी समाज के मन में यह सवाल उठता है – क्या यह जाँच उन कंपनियों तक भी पहुँचेगी जिन्होंने “वन अधिकार अधिनियम 2006” की अनदेखी करते हुए आदिवासी भूमि पर कब्जा किया? क्या PESA कानून के उल्लंघन की भी जाँच होगी? या फिर यह सब सिर्फ FEMA के रुपयों का हिसाब-किताब बनकर रह जाएगा – जिसमें आदिवासियों का दर्द एक बार फिर हाशिए पर धकेल दिया जाएगा?

“वाशिंग मशीन” की राजनीति और जनता का सवाल

भारत में ED का इस्तेमाल एक पैटर्न के रूप में देखा जाने लगा है – जो “साथ” हैं, उन पर छापे नहीं; जो “खिलाफ” जाएँ, उन्हें “साफ” करो। लेकिन वेदांता पर यह छापा उस पैटर्न से अलग है – क्योंकि वेदांता ने सत्तारूढ़ दल को करोड़ों का चंदा दिया था।
तो फिर क्यों? इसका जवाब सत्ता के गलियारों में है – शायद किसी नीतिगत असहमति में, शायद डीमर्जर की शर्तों पर, शायद किसी और लेनदेन के खेल में।

लेकिन जनता के लिए, मज़दूरों के लिए, आदिवासियों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि वेदांता और बीजेपी के रिश्ते में खटास क्यों आई। असली सवाल यह है:

जब वेदांता ने दशकों तक भारत की सार्वजनिक संपदा को निजी मुनाफे में बदला, मज़दूरों को निचोड़ा, आदिवासियों को उजाड़ा, और पर्यावरण को तबाह किया – तब ये जाँच एजेंसियाँ कहाँ थीं? ED की वर्तमान जांच अभी सिर्फ जांच है – इससे किसी प्रकार के उल्लंघन की पुष्टि नहीं होती।

लेकिन इस जांच ने एक पर्दा ज़रूर उठाया है – कि इस देश में सत्ता और पूंजी का गठजोड़ जब टूटता है, तो कानून याद आता है। और जब यह गठजोड़ मज़बूत रहता है, तो श्रमिक, आदिवासी और पर्यावरण – सब कुछ “विकास” की बलिवेदी पर चढ़ जाता है।
जनता की माँग स्पष्ट है: ED की यह जाँच सिर्फ FEMA के कागज़ों तक सीमित न रहे। इसका दायरा बढ़े – BALCO और वेदांता के हर उस अपराध तक, जो श्रमिकों, आदिवासियों और पर्यावरण के खिलाफ किया गया। न्याय आधा-अधूरा नहीं होना चाहिए।

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