शुक्रवार, जून 21, 2024

किसान आंदोलन: वर्तमान चुनौतियां और समाधान के प्रस्ताव

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संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में किसानों ने अकूत बलिदान देकर मोदी सरकार से तीन कृषि कानून वापस कराया था. उस समय किसान आंदोलन की ताकत को मोदी सरकार ही नहीं दुनिया ने महसूस किया था.

नई दिल्ली (आदिनिवासी)। अखिल भारतीय किसान महासभा के उपाध्यक्ष जयप्रकाश नारायण ने किसान साथियों को बताया है कि संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में किसानों ने अकूत बलिदान देकर मोदी सरकार से तीन कृषि कानून वापस कराया था। उस समय किसान आंदोलन की ताकत को मोदी सरकार ही नहीं दुनिया ने महसूस किया था।

किसान आन्दोलन के विजय के निम्न मुख्य कारण थे।
* 01: किसान संघर्ष समन्वय समिति सहित पंजाब हरियाणा के किसान यूनियनों की लंबे समय से चल रही संगठित आंदोलनात्मक तैयारी।
* 02: भारत के सभी किसान संगठनों का एक मंच पर आना और संयुक्त किसान मोर्चा का गठन।
* 03: सरकार द्वारा बहुमत की ताकत का प्रयोग करते हुए मनमाने ढंग से लाये गये तीन कृषि कानून।
* 04: किसानों का मोदी सरकार पर से विश्वास का खत्म होना और कृषि संकट का गहरा होते जाना।
* 05: हठधर्मिता पूर्वक किसानों द्वारा आंदोलनों और लोकतांत्रिक मंचों से उठाई जा रही आवाजों को अनसुना कर देना।

मोदी सरकार द्वारा थोपे गए कृषि कानूनों ने किसान आंदोलन कि आग को दहका दिया था। जिसकी आंच में झुलस कर मोदी सरकार ने कृषि कानूनों को वापस लिया था।

आंदोलन की उपलब्धियां-संक्षेप में आंदोलन की उपलब्धियों को इस तरह सूत्रबद्ध किया जा सकता है।
क, सरकार की हठधर्मिता के चलते सभी विचारों सामाजिक आर्थिक संस्तरों और क्षेत्रों के किसान संगठनों का एक मंच पर आना। ख, किसान संगठनों और नेताओं का संघर्ष के दौरान एक दूसरे को समझने , व्यवहारिक लड़ाई में आपसी समझ का विकसित होना।
ग, सरकार के हर तरह के तिकड़म दमन और प्रलोभन के जाल को भेद कर आंदोलन की एकता और आवेग को बनाए रखना।
घ, धर्म जाति क्षेत्र भाषा लिंग जन्य विभेदों को दरकिनार करते हुए संयुक्त लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना। सरकार की सांप्रदायिक विघटनकारी नीतियों को ध्वस्त कर देना।
च, एकता की ताकत के बल पर सरकार से लड़ते हुए किसानों की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का उन्नत होना।
छ, संयुक्त किसान मोर्चा की एकता को लगातार मजबूत करते जाना, आपसी विश्वास और संबंधों को कायम रखना, सरकार के किसी भी उकसावे में न आना तथा शांतिपूर्ण संघर्ष के रास्ते पर अडिग रहना।
ज, संयुक्त मोर्चे द्वारा सही समय पर सही दिशा नीति कार्यक्रम लेना। किसानों के मुख्य दुश्मन की पहचान करते हुए किसानों को संघर्ष के मैदान में नेतृत्व देना। आंदोलन के जटिल मोड़ों पर दृढता पूर्वक आगे का रास्ता तलाशना और किसान आंदोलन को नई ऊंचाई पर पहुंचाना।
यह कुछ सामान्य विशेषताएं हैं जिसके बल पर संयुक्त किसान मोर्चा ने अब तक की सबसे संगठित क्रूर विघटनकारी और कारपोरेट परस्त सरकार को पीछे धकेला था।

कृषि कानून वापस लेने के बाद मोदी सरकार की रणनीति-मोदी सरकार किसान आंदोलन की सभी उपलब्धियों को धीरे-धीरे मिटा देना चाहती है। वह संयुक्त किसान मोर्चा की एकता किसान संगठनों की आपसी समझदारी विश्वास को भंग कर पहल अपने हाथ में लेना चाहती हैऔर प्रलोभन के साथ विलंब की रणनीति पर काम कर रही है।

जिससे किसान संगठनों का धैर्य टूट जाए और आपसी एकता बिखर जाएं।

यानी फूट, झूठ, बिलंब द्वारा धैर्य की परीक्षा लेते हुए विखराव की घड़ी का इंतजार करना।

इसलिए यह समय किसान आंदोलन और किसान संगठनों के लिए सबसे कठिन समय है।
किसान संगठनों के लिए यह समय ठहर कर आगे की रणनीति पर विचार करने और उसे ठोस करने का है।

इस समय किसान संगठनों की एकता को बनाए रखना सर्वोपरि कार्यभार है।

इसके लिए संगठनिक लाभ, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और विचारों की सर्वोच्चता को त्यागना होगा।
जरूरत है कि कार्य नीतियों व मुद्दों को लोकप्रिय शैली में सूत्र बद्ध करने का।

हम सभी समझ रहे हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा की वर्तमान स्थिति से मोदी सरकार लाभ उठाकर उपलब्धियों को मटियामेट कर देना चाहती है।
इसलिए हमारे सामने पहला कार्यभार है कि हम एसकेएम के अंदर हुए बिखराव का लाभ मोदी सरकार को उठाने न दें।
साथियों, ऐतिहासिक तथ्य है कि इतिहास की किसी भी उपलब्धि को उसी रूप में दुहराया नहीं जा सकता। इसलिए बदले हुए परिवेश में लंबित पड़ी मांगों को केंद्रित करते हुए नये मांगों नारों को सूत्रबद्ध करना समय की जरूरत है।

इसलिए किसी भी आंदोलन की घोषणा से पहले हमें थोड़ा ठहर कर सोचना होगा कि हमारी कतारें, व्यापक किसान जनता “क्या आंदोलन के जिस रुप कि हम घोषणा कर रहे हैं “उसके लिए तैयार है या नहीं।

हमें परिस्थिति में हुए विकास को अवश्य समझना चाहिए। नहीं तो नेताओं के मनोगत इच्छा और उनके नेतृत्व की प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए “आंदोलन की घोषणा” आंदोलन की ताकत और साख को निश्चय ही कमजोर करेगी।
किसान आंदोलन शुरू होने से पहले स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने, सी+२पर 50% मुनाफा जोड़कर एमएसपी तय करने के सवाल पर किसान संघर्ष समन्वय समिति सहित अनेक संगठनों में राष्ट्रीय स्तर का जन जागरण अभियानचलाया था। मुद्दों पर किसानों को जागरूक कियागया था। संगठनिक सक्रियता को उन्नत स्तर ले जाकर राष्ट्रीय स्तर पर किसान आंदोलन का वातावरण तैयार किया गया था।

इसके अतिरिक्त पंजाब और हरियाणा की किसान जत्थे बंदियों ने विभिन्न सवालों के साथ कृषि में कारपोरेट घुसपैठ के खिलाफ पहले से ही चक्का जाम प्रदर्शन धरना चला रही थी।
पंजाब की कृषि की संकटग्रस्त स्थिति के कारण पंजाब के किसानों में आंदोलन का वातावरण पहले से बना हुआ था।

इन सब कारणों से कृषि कानून आने से पहले ही भारत में किसान आंदोलन की परिस्थिति तैयार थी।

कोरोना महामारी की आड़ लेकर ज्योंहिं मोदी सरकार कृषि कानून ले आयी तो पंजाब सहित शेष भारत में किसान आंदोलन की सुलगती आग भभक ऊठी और उसकी लपेट में दिल्ली की सरकार आ गई।।
इसलिए ” दिल्ली चलो” का आवाहन आते ही पंजाब से किसानों का सैलाब दिल्ली की तरफ उमड़ पड़ा। जिसको भारत सरकार सहित संपूर्ण विश्व के शासक वर्ग विस्फारित नेत्रों से देखते रहे। देखते ही देखते इतिहास का अनूठा किसान आंदोलन धरती के महत्वपूर्ण भाग पर उठ खड़ा हुआ।

आज हम किसी भी मंच से आंदोलन का आह्वान कर रहे हैं तो हमें वस्तु स्थिति का यथार्थ मूल्यांकन करना चाहिए,। नहीं तो इतिहास दोहराने के नाम पर हम,,,,,,,,,, बनकर रह जाएंगे।
परिस्थिति में बदलाव- किसान भाइयों कृषि कानूनों के वापस लेने के ‌9 महीने के बाद परिस्थिति में कुछ बदलाव आया है ।

आंदोलन का वेग कम हुआ है। हमारी एकता कमजोर हुई है। अविश्वास और आशंकाएं बढ़ी है। संयुक्त किसान मोर्चा के नाम पर काम कर रही कमेटी की विश्वसनीयता घटी है। उसकी सिकुड़न जारी है।
अधिकतर किसान आधार निष्क्रिय है और एसकेएम के फोल्ड से बाहर चला गया है।किसानों की समस्याओं के बढ़ जाने के बावजूद आक्रोश और आंदोलन का आवेश घटा है।
इसलिए जल्दीबाजी में लिया गया किसी भी तरह का अतिवादी कार्यक्रम किसान आंदोलन को छति पहुंचाएगा। हताशा निराशा को जन्म देगा तथा कर्मकांड बनकर रह जाएगा।
आंदोलन के लिए तैयारी का समय -यह समय भावी किसान आंदोलन के लिए तैयारी का समय है। हमें सरकार की घोषित कमेटी का विरोध जारी रखते हुए एमएसपी कानून की मांग के साथ लंबित पड़ी सभी मांगों को मनवाने के लिए किसानों के बीच व्यापक जन अभियान जन संपर्क को तेज करने की जरूरत है।
साथ ही किसान यात्राओं और छोटे बड़े सम्मेलनों की श्रृंखला के साथ किसानों को पुनः जागृत करने के लिए नए नए फार्मूले और नीतियां बनाने और जन अभियान चलाने की जरूरत है।
सिर्फ ऊपर से कुछ जुझारू दिखने वाले कार्यक्रम थोप देने से कोई आंदोलन नहीं खड़ा हो जाता।

किसान संगठनों की एकता समय की मांग- प्रमुख सवाल यह है कि किसान संगठनों की एकता को कैसे पुनः बहाल कर विश्वास को वापस लाया जाय।
इसके लिए सर्वप्रथम संयुक्त किसान मोर्चा की 5 सदस्य कमेटी को भंग कर दिया जाए। दूसरा , किसान संगठनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाए।
तीसरा, सम्मेलन में आंदोलन का एजेंडा और दिशा निर्धारित की जाए ।
चार्, सभी किसान संगठनों को लेकर एक राष्ट्रीय स्तर की समन्वय समिति बनाई जाए।जिसकी अगुवाई में आगे के कार्यक्रम निर्धारित किए जाएं।
यह समिति आंदोलन संगठन और मांगों की मुकम्मल फेहरिस्त तैयार करें। लेकिन इसका हर समय ध्यान रखा जाए यह एक संयुक्त मोर्चा है।
संयुक्त मोर्चे को संयुक्त मोर्चे के ही नियमों अनुभवों परंपराओं के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए।
वृहत्तर लोकतांत्रिक संबंधों पर आधारित सभी तरह के किसान संगठनों की एकता आज के समय की मांग है। नहीं तो हम छोटे गुट बनकर रह जाएंगे।
साथ ही मोदी सरकार द्वारा ली जाने रही राजनीतिक पहल कदर्मियो का हम ठोस जबाब नहीं दे पाएंगे और ऐतिहासिक किसान आंदोलन में दी गई कुर्बानियों और उपलब्धियों को खो बैठेंगे ।
जिसका अंतिम परिणाम होगा कि समय के साथ कृषि पर हो रहे कारपोरेट हमलों का मुकाबला करने में हम अपने को असमर्थ पाएंगे।
साथियों, मैं फिर एक बार यह बात रेखांकित करना चाहूंगा कि वर्तमान समय नवंबर 2020 से ज्यादा कठिन है। इस वास्तविकता को नजरअंदाज करके किसी भी तरह के आंदोलनात्मक कार्यक्रम की घोषणा वस्तुतः सरकार को मजबूत बनायेगी और आंदोलन को कमजोर करने में ही मददगार होगी।
इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि आप सभी साथी गण ऊपर दिए गए सुझाओं को सकारात्मक रूप में लेगें। शीघ्र ही एक राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाकर आगे की रणनीति तैयार करने के लिए प्रयास करेंगे ।
राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णयों के आलोक में ही आगे हमारा संघर्ष बढ़ सकेगा।
उम्मीद है कि सभी किसान संगठन और उनके नेता इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करेंगे।
आप सभी साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन के साथ।


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