चर्चा-समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कार्यस्थल तक की यात्रा भी अब मानी जाएगी रोजगार का हिस्सा

न्याय की नई परिभाषा भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि कानून का अर्थ केवल शब्दों की सीमाओं में नहीं, बल्कि न्याय के उद्देश्य में निहित होता है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय - जिसमें यह...

बालको विद्रोह: जब मजदूरों की आवाज ने वेदांता साम्राज्य की चुप्पी तोड़ी

बालको की राख से उठती आवाज़: जब ‘विकास’ शोषण की फैक्ट्री बन जाता है छत्तीसगढ़ की धरती पर एक बार फिर वही सवाल गूंज रहा है — "क्या यह देश कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों की जागीर बन चुका है?" वेदांता समूह...

सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने की घटना: सनातन के नाम पर वर्ण व्यवस्था और संविधान के बीच संघर्ष

नागपुर में सनातन का जाप और संविधान पर उछलता जूता! मजमून के मुकाबले जूते के चलने को अपने शेर में “बूट डासन ने बनाया, मैंने एक मजमूँ लिखा / मेरा मजमून रह गया डासन का जूता चल गया” में दर्ज...

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की स्थापना: दादा हीरा सिंह मरकाम का दृष्टिकोण और शोषित समाज के सशक्तिकरण का संघर्ष

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की स्थापना केवल एक राजनीतिक संगठन के गठन की घटना नहीं, बल्कि भारत के शोषित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों के सामाजिक-राजनीतिक पुनरुत्थान की दिशा में एक ऐतिहासिक आवश्यकता थी। इस पार्टी के संस्थापक दादा हीरा सिंह...

आरएसएस 100 साल पूरे: भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव

भारतीय तिथि के अनुसार 2 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना को सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। पिछले 11 वर्षों से आरएसएस, जो एक सांप्रदायिक-फासीवादी संगठन है, देश पर शासन कर रहा है और भारत...

भगत सिंह की 118वीं जयंती: क्या ‘जेन-जी’ पूरा कर रही है शहीद-ए-आज़म के सपनों को?

आज, जब हम महान क्रांतिकारी और विचारक शहीद भगत सिंह की 118वीं जयंती मना रहे हैं, यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या उनके सपनों का भारत बन पाया है? भगत सिंह ने जिस शोषण-मुक्त और न्यायपूर्ण समाज की...

मणिपुर का दर्द और मोदी का ‘पर्यटन’: 865 दिनों के इंतजार के बाद भी ज़ख्मों पर मरहम क्यों नहीं?

पूरे 2 साल 4 महीने 10 दिन बाद देश के प्रधानमंत्री को मणिपुर की याद आई और 13 सितम्बर को वे पर्यटन करने, पीड़ा से कराहते, डरे सहमे और असुरक्षित नागरिकों के बीच जा पहुंचे। 3 मई 2023 को...

पूंजी, श्रम और मानवता का भविष्य: कॉरर्पोरेट मुनाफा और आदिवासी सीख

आज जब दुनिया विकास की नई ऊंचाइयों को छू रही है, तब एक सवाल बार-बार उठता है - क्या इस विकास की कीमत इंसान और इंसानियत चुका रहे हैं? कल-कारखानों से लेकर खेतों तक, दिन-रात पसीना बहाने वाले मजदूरों...

धर्मस्थल का सच: सैकड़ों अप्राकृतिक मौतें और दफ़न, न्याय की अनकही कहानी

धर्मस्थला में दबे सत्य और न्याय को उजागर करना जरूरी हरे-भरे जंगलों और धीमी-धीमी बहती जलधाराओं से घिरा, और चूंकि यह बरसात का मौसम है - बहते पानी का तेज़ खिंचाव, बारिश की पुकार करते मोर और तोतों की चहचहाहट ;...

विश्व आदिवासी दिवस पर सत्ता का मौन: भाजपा “आदिवासी” शब्द से क्यों डरती है?

"जब पूरी दुनिया आदिवासी दिवस मना रही थी तब भारत में भाजपा ने चुप्पी क्यों साध ली? जानिए “आदिवासी” शब्द से उनके डर की असली वजह और उसके राजनीतिक मायने।" 9 अगस्त को पूरे विश्व में, विश्व आदिवासी दिवस मनाया...

Latest News

भारत-अमेरिका व्यापार सौदा: किसानों की रोज़ी-रोटी दाँव पर, 500 अरब डॉलर की एकतरफा गुलामी का जश्न

साम्राज्यवाद के आगे लाल गलीचा बिछाकर आत्म-समर्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी साम्राज्यवाद के हुक्म के आगे आत्म-समर्पण कर...