रायगढ़/तमनार (आदिनिवासी)। रायगढ़ जिले के तमनार स्थित लिबरा के CHP चौक पर पिछले दो सप्ताह से जारी ग्रामीणों का संघर्ष अब एक ऐतिहासिक जनआंदोलन का रूप ले चुका है। आज आंदोलन के 14वें दिन भी हाड़ कंपा देने वाली ठंड की परवाह किए बिना हजारों ग्रामीण पर्यावरणीय जनसुनवाई को निरस्त कराने की मांग को लेकर सड़क पर डटे रहे। यह आंदोलन अब केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों के जल, जंगल और जमीन को बचाने के संकल्प का प्रतीक बन गया है।
अभूतपूर्व एकजुटता: 17 गांवों का मिला साथ
गुरुवार का दिन इस आंदोलन के लिए बेहद अहम रहा। ग्रामीणों के इस संघर्ष को बल देने के लिए आज बर्रा कोल ब्लॉक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बरगढ़ खोला के 12 गांव और पुरुंगा कोल ब्लॉक क्षेत्र के 5 गांवों के हजारों निवासी समर्थन देने पहुंचे। हजारों की संख्या में उमड़े इस जनसैलाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमनार के ग्रामीण अब पीछे हटने वाले नहीं हैं। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘ग्रामीण एकता जिंदाबाद’ के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।
सड़क पर जीवन और ‘आंदोलन का खाना’
पिछले 14 दिनों से तमनार के ग्रामीण अपने घरों की सुख-सुविधाएं छोड़कर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। आंदोलन स्थल पर चल रहे सामुदायिक भोजनालय (लंगर) के बारे में भावुक होकर आंदोलनकारी राजेश मरकाम ने कहा, “दुनिया का तमाम लजीज खाना एक तरफ और हमारे आंदोलन का खाना एक तरफ।”
यह वाक्य सिर्फ स्वाद के बारे में नहीं, बल्कि उस भाईचारे और साझे संघर्ष की मिठास को बयां करता है, जिसने इन हजारों लोगों को एक परिवार में बदल दिया है। हालांकि, इस एकजुटता के पीछे एक गहरी पीड़ा भी छिपी है – पीड़ा अपने ही घर में बेगाने होने की और प्रशासन द्वारा अनदेखा किए जाने की।

कड़कड़ाती ठंड में माताओं और बुजुर्गों का संघर्ष
रात के 1 बज रहे हैं, तापमान तेजी से गिर रहा है और ठंड अपनी चरम सीमा पर है। इसके बावजूद, तमनार की माताएं, बहनें, नौजवान और सियान (बुजुर्ग) पूरी निष्ठा के साथ सड़क पर जमे हुए हैं। जहाँ एक ओर लोग रजाई में दुबके हैं, वहीं ये आंदोलनकारी ठंडी हवाओं के थपेड़े सहते हुए अपनी मांगों के लिए पहरा दे रहे हैं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोरने के लिए काफी है, सिवाय शायद उन हुक्मरानों के जो सत्ता के गलियारों में बैठे हैं।

प्रभारी मंत्री का दौरा और जनता का आक्रोश
आंदोलनकारियों में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि रायगढ़ जिले के प्रभारी मंत्री रामविचार नेताम का जिले में दौरा हुआ, लेकिन उन्होंने तमनार में 14 दिनों से संघर्ष कर रही जनता की सुध लेना जरूरी नहीं समझा।
आंदोलनकारियों का कहना है कि शासन और प्रशासन ने आंखों पर पट्टी बांध ली है। ग्रामीणों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “यह जनता है, सब जानती है। जब सत्ता पर बैठे लोग बेपरवाह हो जाते हैं, तो यही जनता उन्हें अर्श से फर्श पर लाने में देर नहीं लगाती।”
संवेदनशीलता की दरकार
तमनार का यह आंदोलन अब केवल एक प्रशासनिक मांग तक सीमित नहीं रह गया है, यह मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बन चुका है। कड़कड़ाती ठंड में सड़क पर सो रहे ये बुजुर्ग और बच्चे, सरकार की संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। प्रशासन को यह समझना होगा कि फाइलों में दर्ज विकास के आंकड़े, जमीन पर संघर्ष कर रहे इन इंसानों की आंसुओं से बड़े नहीं हो सकते। सरकार को जल्द से जल्द अपनी ‘बेरुखी’ त्यागकर संवाद का रास्ता अपनाना होगा, इससे पहले कि यह असंतोष किसी बड़े विस्फोट का रूप ले ले।




