बुधवार, जून 26, 2024

संघ-भाजपा का नया जुगलबंदी: “ना तुम हमें जानो ना हम तुम्हें जाने” चुनावी रणनीति या असलियत!

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अचानक से एक बार फिर आरएसएस और भाजपा के बीच “न तुम हमें जानो, न हम तुम्हें जाने” के युगल गीत की जुगलबंदी शुरू हो गयी है। जितना पुराना यह मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और हेमंत कुमार और सुमन जी की आवाज में गाया गीत है – उतनी ही पुरानी, शायद उससे भी कुछ अधिक पुरानी इसे एक निश्चित अंतराल के बाद इस कुनबे द्वारा गाये और बेसुरेपन से दोहराए जाने की प्रवृत्ति है। इस बार शुरुआत सेवा विस्तार – एक्सटेंशन – पर चल रहे भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने की। मनपसंद मीडिया के साथ इन दिनों धड़ाधड़ चल रहे प्रायोजित इंटरव्यूज की श्रृंखला के एक साक्षात्कार में उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा कि पार्टी अब आरएसएस से स्वतंत्र हो गई है और उसे अब किसी मददगार की ज़रूरत नहीं है।

संघ को एक वैचारिक और सांस्कृतिक संगठन बताते हुए उन्होंने दावा किया कि “शुरू में हम अक्षम होंगे, थोड़ा कम होंगे, तब आरएसएस की जरूरत थी, अब हम बड़े हो गए हैं, बढ़ गए हैं, सक्षम हैं …. अब भाजपा अपने आप को चलाती है।“ नड्डा ने यह बात पांचवे दौर के मतदान के ठीक एक दिन पहले कही। तब तक हुए चार चरणों के चुनाव में हुए कम मतदान के साथ इसे जोड़कर देखा गया और इस कम मतदान के लिए आरएसएस द्वारा दिखाई गयी कथित बेरुखी के अक्स में इसे पढ़ा गया। इसी के साथ हजार तरह की आशंकाओं और संभावनाओं पर चर्चाएँ शुरू हो गयी। अनेकानेक व्याख्याएं की जाने लगीं। कईयों ने इसे संघ-भाजपा के रिश्तों में आई खटास माना और इसके पश्चातवर्ती प्रभावों के बारे में अनुमान लगाना शुरू कर दिया।

जो संघ को जानते हैं और जनसंघ के जमाने से इसके अपनी राजनीतिक भुजा के साथ संबंधों की द्वंद्वात्मकता को जांचते-परखते रहे हैं, वे जानते हैं कि यह शेक्सपीयर के प्रिंस हेमलेट का होने या न होने – टू बी ऑर नॉट टू बी – का संशय या द्वन्द्व नहीं है, यह भारतीय दर्शन में निम्बार्क का दिया वह द्वैताद्वैत है, जो एक साथ द्वैत और अद्वैत दोनों के पृथक, किन्तु पारस्परिक पूरक और निर्भर अस्तित्व को स्वीकार करता है और कहता है कि मिट्टी ही घड़ा बन जाती है। उसके बिना घड़े की कोई सत्ता नहीं। यही घड़ा बाद में मिट्टी भी बन जाता है। गरज यह कि कभी मिट्टी-मिट्टी, कभी घड़ा-घड़ा करना इस कुनबे की राजनीतिक कार्यनीति की एक विधा है, एक आजमाई हुयी अदा है, जिसे अभी तक संघ आजमाता रहा है। नई बात यह है कि इस बार भाजपा ने इसे पहली बार इस तरह से कहा है।

हालांकि इसमें ताज्जुब की बात नहीं है ; ताजे अतीत में जाएँ, तो जब-जब राजनीतिक  मुकाबला टाइट और फंसा हुआ लगा है, जब-जब विपरीत नतीजे आने की संभावनाए बनी हैं, तब-तब मिट्टी ने खुद को घड़े से अलग दिखाने के प्रयत्न किये हैं। इसके पीछे खीर में साझे और महेरी में न्यारे होने की पूर्व तैयारी के अलावा संघ की अपराजेयता की छवि बनाए रखने की चतुराई भी है। यह मिथ्या आभास देना है कि संघ ने काम नहीं किया, इसलिए वैसे परिणाम नहीं आये। यह कुनबा समय-समय पर इस तरह की लहरें लेता रहा है, नया सिर्फ इतना है कि पटकथा लेखकों ने इस बार यह संवाद भाजपा अध्यक्ष से बुलवाने का तय किया है।  
कहने का  मतलब ये बिलकुल नहीं है कि संघ और मोदी की भाजपा के बीच सब कुछ अच्छा-अच्छा है। एकदम भरत मिलाप जैसी स्थिति तो यूँ भी कभी नहीं रही, प्राथमिकता और संभाव्यता को लेकर असहमतियां स्वाभाविक है, वे हमेशा रहीं भी। संघ के सबसे लोकप्रिय और काबिल माने जाने वाले स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी रहीं। यही असहमतियां थीं, जिनने अपने तबके सबसे खांटी स्वयंसेवक लालकृष्ण अडवानी की कमंद ठीक उस समय तोड़ दी, जब हाथ भर ही दूर उनका लबे बाम रह गया था और इस तरह भरी दोपहरी में ही उनके राजनीतिक अध्याय का सूर्यास्त कर दिया। मगर इस बार मसला पहले से कुछ ज्यादा ही अलग हैं। इस बार इधर शीर्ष पर नरेन्द्र मोदी हैं ; वे मोदी, जिनका इस मामले में कुछ अलग ही तरह का ट्रैक रिकॉर्ड है। वे होने को इसी कुनबे के हैं – उसी बेल के सहारे पनपे और ऊपर उठे हैं, जिन पर कभी अटल, आडवाणी पुष्पित और पल्लवित हुए थे, मगर इसके बाद भी वे अलग हैं, क्योंकि संघ जिस फासिस्ट और एकाधिकारवादी विचारधारा के विषाणु का वाहक है, मोदी उसके ज्यादा विकसित – म्यूटेटेड – संस्करण है। उनमें नारसिसी आत्ममुग्धता की एंटी-विटामिन की अतिरिक्त शक्ति और अहंकार का एक्स्ट्रा एंटी-प्रोटीन तो है ही, अडानी, अम्बानी और देसी विदेशी कारपोरेट पूंजी का सुरक्षा कवच भी है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वे दिखा चुके हैं कि उन्हें एक साथ साधना और निबटाना दोनों काम करना बखूबी आता है। गोधरा के बाद हुए गुजरात दंगों में, जो आजाद भारत में कभी नहीं हुआ, वह करते हुए वे प्रदेश के आरएसएस को उसकी हैसियत दिखाना भी जानते हैं।

यही काम कुछ हद तक उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी किया और ऐसा करने का सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया। आरएसएस को पांच हाथ की दूरी पर रखकर उसे, खासकर उसके वर्तमान सरसंघचालक को, उनकी हैसियत दिखाई ; खुद अपने मुंह से जितनी बार उन्होंने मोदी-मोदी-मोदी किया है और किसी विचार कुटुंब की बजाय खुद अपना मोदी का परिवार खड़ा किया है, उसकी दुनिया की राजनीति में शायद ही कोई मिसाल हो। संघ पिछले सौ साल से खुद को पहले राष्ट्र और उसकी आड़ में जिस हिन्दू राष्ट्र का पर्यायवाची बनाने में लगा हुआ था – मोदी ने खुद को उसका समानार्थी बना डाला। इस तरह के एकालापी और आत्मोन्मुखी बर्ताब छोटे से घरेलू परिवारों में तनाव पैदा कर सकते हैं ; संघ परिवार में भी इसकी प्रतिक्रियाएं हुयी ही होंगी। लिहाजा थोड़ी बहुत खटास लाजिमी है । मगर क्या वह इतनी है कि दही जमा सके? नहीं!!
इसलिए कि राजनीति में दो गुणा दो हमेशा चार नहीं होता, एक्स्ट्रा 2 ए बी ढूंढ निकालने वाले गणित के प्रकाण्ड ज्ञानियों की राजनीति में तो बिलकुल नहीं होता। इसके कई कारण गिनाये जा सकते हैं। मगर हमेशा कुछ कारण होते हैं, जो निर्णायक और प्रमुख होते हैं, यहाँ भी हैं । पहला तो यही है कि जो संघ को जानते हैं, वह इसकी लोचनीयता और नमनीयता – फ्लेक्सिबिलिटी – को भी जानते हैं। इसकी स्लीपर सेल्स और उनके जरिये अलग-अलग सत्ता प्रतिष्ठानों, संस्थानों, दलों, संगठनों में काम करने की खूबी से भी परिचित हैं। मौके और माहौल को देखकर अलग-अलग बातें करने के दोमुंहेपन के कौशल से भी अवगत हैं ; संघ लोगों को दिखाने के लिए कभी पाकिस्तान को भाई बता सकता है, मुसलमानों को देश से बाहर भेजने वालों को हिन्दू मानने से इंकार कर सकता है, वहीँ उसी सांस में मुसलमानों की बढ़ती आबादी वगैरा की दुहाई देकर हिन्दुओं को खतरे में बता सकता है। इनके प्रमुख काशी और मथुरा को बाबरी बनाने की दुहाई देते-देते दिल्ली की दरगाह की जियारत कर सकते हैं, इमरजेंसी का समर्थन करते हुए इंदिरा गांधी और संजय गांधी की शान में कसीदे काढ़ सकते हैं और मौक़ा आने पर लोकतंत्र की बहाली के योद्धा भी बन सकते हैं।

अपनी भुजाओं को अलग-अलग दिशा में लहराने और दुनिया को दिखाने के लिए उन दोनों के पंजा लड़वाने में तो उसकी महारत है ; इधर एक भुजा हर क्षेत्र में 100 फीसद विदेशी निवेश कर देसी उद्योग धंधों को तबाह करती है, उधर बीएमएस के नाम की दूसरी भुजा उसके खिलाफ जलसा-जलूस करती है। कुल मिलाकर यह कि संघ वह संगठन है, जो धीरज के साथ, सारी लानत-मलामत सहते हुए भी अपने लिए मुफीद समय आने का इन्तजार कर सकता है, वैचारिक विरोधियों के तंत्र में रहकर भी अपना काम निकाल लेता है। यहाँ तो मोदी हैं, जो भले थोड़े टेढ़े हैं, तब भी उनके मेरे हैं । 

दूसरी, ज्यादा मानीखेज बात यह है कि यही दस साल हैं, जो “संघ की पाँचों उंगली घी में और सर कडाही में” के काल रहे हैं। हर तरह से उसके स्वर्णिम काल के रहे हैं। यही वह कालखंड है, जब उसका सांगठनिक विस्तार  सर्वग्रासी और सबसे ज्यादा तेजी के साथ हुआ। इससे ज्यादा अहम् यह हुआ कि मोदी राज में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को उसकी अब तक की सर्वोच्च तीव्रता तक पहुंचाया गया है, सत्ता के हर तंत्र का दुरुपयोग करके, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री जैसे पद का भी इस्तेमाल करके मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष और नफरत को कलुषता के शिखर तक ले जाया गया है। इस तरह आरएसएस के विभाजनकारी एजेंडे को मान प्रतिष्ठा ही नहीं दी गयी, बल्कि उसे हर तरह का संरक्षण देकर विस्तार दिया गया, उसका सुदृढ़ीकरण किया गया। मोदी राज संघ के धन-धान्य के भंडारों को भरपूर और लबालब भरने वाला रहा है। इस दौरान हर जिले में सिर्फ भाजपा के दफ्तर ही नहीं बने, संघ के केशव कुञ्ज की अट्टालिकाएं भी खड़ी हुयी हैं ;  ये दस साल उसके लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष दोनों एक साथ पा लेने और इस तरह कुबेर के खजाने का पासवर्ड हथिया लेने वाले दस वर्ष रहे हैं।

यह दशक निस्संदेह “इंडिया दैट इज भारत” शब्दों से शुरू होने वाले संविधान में वर्णित भारत की अवधारणा को अकल्पनीय नुक्सान पहुंचाने वाला दशक है ; किंतु विडम्बना यह है कि इसी के साथ यह 1857 से लेकर आजाद भारत के ज्यादातर कालखंड में जनता द्वारा ठुकराई गयी समझदारी के तकरीबन राज्यारोहण का भी दशक है। जिन-जिन नकारात्मक और प्रतिगामी मूल्यों का प्रतिनिधि संघ रहा, उन सभी को इन दस वर्षों के मोदी राज में स्थापित और प्राण-प्रतिष्ठित किया गया : जैसे पूँजी पिशाचों – कार्पोरेट्स का खुल्लमखुला राज कायम करना, सामंतशाही को उसके सार में नहीं, बल्कि राजा-महाराजाओं की प्रशंसा करके उनकी सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ाकर रूप में भी प्रतिष्ठित करना, वर्णाश्रम को भारतीय समाज की जीवन शैली बताकर उसकी बहाली के उपाय करना और मनु के भूत को देवत्व प्रदान करना, सिर्फ दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों तथा अल्पसंख्यकों को ही नहीं, देश की आधी आबादी स्त्री को भी एक बार फिर अंधेरी गुफा में धकेल देने के काम इस दौर में हुए। यह संघ का एजेंडा था – जिसे सब कुछ के बावजूद मोदी राज ने पूरे भक्तिभाव से लागू किया है। इतिहास को बदल कर उसे संघ-फ्रेंडली बनाने से लेकर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी अमरीका और दुष्ट इसराईल को तरजीह देना इसी का हिस्सा है। यही वह समय है, जब देश के सभी संस्थानों – सभी मतलब न्यायपालिका, फ़ौज मिलिटरी तक सभी – में संघ की घुसपैठ सुनिश्चित की गयी। कश्मीर में आरएसएस का शिविर लगवाने में सेना को वालंटियर बनाकर जो आरंभ हुआ था, वह पुलिस थानों, तहसीलों, कलेक्ट्री सहित प्रशासन के हर ठीये और विश्वविद्यालयों, राजदूतावासों से लेकर हर जगह पर एक न एक भाई जी को बिठाने और निर्णय उसी से पूछकर लिए जाने के प्रबंध के साथ हुयी। बाद में इस राहुग्रास में फिल्म संस्थान, साहित्य, संस्कृति से होते हुए खेलकूद तक को ले लिया गया। मीडिया – सोशल मीडिया में भी – ऐसे बटुक बिठाए गए, जो इनके अनुकूल इको-सिस्टम बना सकें। यहाँ तक कि केंद्र तथा राज्य सरकारों के मंत्रियों तक के दफ्तरों में उनकी पसंद के नहीं, संघ से प्रतिनियुक्ति वाले सचिव, ओएसडी और क्लर्क पदस्थ किये गए।

हर स्तर पर संगठन मंत्री के रूप में सीधे संघ स्वयंसेवकों को बिठाने का प्रबंध करते हुए भाजपा को भी इसी तरह की कड़ी जकड़न और नियंत्रण में रखा गया है। इसमें कहीं कोई गफलत न हो जाए, इसलिए बाकी सब पदाधिकारियों के तो चुनाव इत्यादि होंगे, मगर ये संगठन मंत्री ऊपर से नियुक्त किये जायेंगे, इस तरह के प्रावधान भी भाजपा के संविधान में किये गए हैं। संघ और उसके नेता अपने सम्मान, अपने इंडिविजुअल या इंस्टीट्यूशनल ईगो के प्रति इतने भी आग्रही नहीं है कि वे हर रोज पूरी पोल्ट्री फॉर्म भर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी से पंगा ले। ठीक यही प्रलोभन है कि जेपी नड्डा के इतने उकसावे भरे बयान के बावजूद आरएसएस की तरफ से कोई चूं-चां तक नहीं हुई, कोई  प्रतिक्रिया या टिप्पणी नहीं आयी।  

कुछ लोग है, जो अभी भी संघ के बारे में खुद संघ द्वारा की गयी मार्केटिंग में गिनाये गए उसके और उसके स्वयंसेवकों के कथित सद्गुणों को सच माने बैठे हैं। असल में तो वे दिन कभी थे ही नहीं, जब पसीना गुलाब था …. कुछ अपवादों में यदि रहा भी होगा, तो अब उसका तर्पण और श्राद्ध किया जा चुका है। ईमानदारी, चरित्र की शुचिता, साधनों की पवित्रता, भ्रष्टाचार से विरक्तता अब पुरानी बातें हो गयी हैं। संघ अब, जिसे व्यावहारिक राजनीति कहा जाता है, उसका सबसे अगुआ खिलाड़ी  है ; अब विकास जय शाह से शुरू होकर वहीँ पूरा होता है। अब खैरात का शुभारंभ घर से ही होता है और उसका उद्यापन भी घर में ही हो जाता है।

जो लोग संघी बटुकों में 18वीं लोकसभा के चुनाव में 2019 जैसा उत्साह – यूफोरिया – न देखकर कुछ और ही कयास लगा रहे हैं, उनकी नजर से एक गुणात्मक रूप से भिन्न बात छूट रही है और वह यह है कि बावजूद सारे नफरती ध्रुवीकरण के ये मोदी सरकार की विफलताएं है, जो इतनी चौतरफा और इतनी ज्यादा हैं कि आरएसएस के गली-मोहल्ले के भाई जी, जिनके अपने परिजन भी मोदी राज की आपदाओं से पीड़ित हैं, वे उनका जवाब नहीं ढूंढ पा रहे हैं और अपने स्वभाव के अनुरूप लोगों के गुस्से को झेलने का जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं। वे उत्साह के साथ चुनाव में काम नहीं कर रहे, यह कहना सही नहीं है – असलियत यह है कि पिछली वर्षों के अनगिनत संघर्षों और मोदी राज की जाहिर-उजागर नाकामियों ने उनकी बोलती बंद की हुयी है। इनकी आवाज वापस लेने के लिए ही मोदी को गारंटी-वारंटी को छोड़कर सीधे हिन्दू मुसलमान करना पड़ा था।

उन्हें भी 4 जून का इंतज़ार है। उसके बाद ही वे तय करेंगे कि उन्हें नड्डा और जिनके कहने पर उन्हें इतना सब बोलने का साहस हुआ है, उन मोदी का क्या करना है!! आश्चर्य मत कीजिएगा कि यदि जैसे नतीजे दिख रहे हैं, वैसे आ गए, तो मोदी फिनोमिना को सिराने में यही संघ सबसे आगे नजर आये।    
(आलेख : बादल सरोज)

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)


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