गुरूवार, फ़रवरी 19, 2026

झारखंड: विकास के नक्शे पर मिटते 4361 गांव; अपनी ही माटी से बेदखल होते 30 लाख लोगों की अनसुनी दास्तान

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भारत की खनिज संपदा का ह्रदय कहा जाने वाला झारखंड आज एक ऐतिहासिक और मानवीय त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है। राज्य में औद्योगीकरण और विकास के नाम पर जिस पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की तैयारी चल रही है, उसने ‘जल, जंगल और जमीन’ की लड़ाई को एक निर्णायक मोड़ पर ला दिया है। हाल ही में सामने आए सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़े किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं। कुल 19,48,807 एकड़ जमीन का अधिग्रहण और लगभग 30 लाख लोगों का संभावित विस्थापन—यह सिर्फ एक सांख्यिकीय डेटा नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता के उजड़ने का ‘रेड अलर्ट’ है।

विकास का विरोधाभास: मालिक से मजदूर बनने का सफर
क्या विकास का अर्थ केवल गगनचुंबी कारखाने और चमकते हाइवे हैं? झारखंड के संदर्भ में यह सवाल अब जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है। राज्य के 24 जिलों में करीब 4000 कंपनियों और 418 कारखानों के लिए जमीन का जाल बिछाया जा रहा है। सरकार इसे आर्थिक प्रगति का नाम दे रही है, लेकिन जमीनी हकीकत भयावह है।

जिन 4361 गांवों की जमीन ली जा रही है, वहां के आदिवासी और मूलवासी सदियों से कृषि और वनोपज पर निर्भर रहे हैं। अपनी जमीन पर जो कल तक ‘मालिक’ था, भूमि अधिग्रहण के बाद वही किसान अपने ही आंगन में बनी फैक्ट्री के गेट पर ‘दिहाड़ी मजदूर’ या ‘दरबान’ बनने को मजबूर हो जाएगा। यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान की हत्या है।

सांस्कृतिक विच्छेद: जब जड़ें ही काट दी जाएं
आंकड़ों की गहराई में जाएं तो स्थिति और भी विकराल नजर आती है। दुमका में 7,39,017 एकड़ और चाईबासा में 3,25,740 एकड़ जमीन का अधिग्रहण प्रस्तावित है। सरायकेला का भी यही हाल है। झारखंड के आदिवासी समाज के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी ‘मां’ और उनकी सांस्कृतिक पहचान (Identity) है।

जब एक गांव उजड़ता है, तो केवल घर नहीं टूटते; वहां की भाषा, लोकगीत, परंपराएं और वह ‘सामुदायिक सुरक्षा’ भी टूट जाती है जो शहरों की भीड़ में कहीं नहीं मिलती। विस्थापन का सीधा अर्थ है- अपनी जड़ों से कटकर एक अनजान भीड़ का हिस्सा बन जाना।

पर्यावरण और भविष्य पर संकट
झारखंड को भारत का ‘फेफड़ा’ माना जाता है। लाखों एकड़ वन भूमि का औद्योगिक कंक्रीट में बदलना जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को खुला निमंत्रण है। अंधाधुंध खनन से नदियां काली पड़ रही हैं और हवा जहरीली। हम आने वाली पीढ़ी को विरासत में खनिज तो दे सकते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें पीने के लिए साफ पानी और सांस लेने के लिए शुद्ध हवा दे पाएंगे? यह सौदा घाटे का नहीं, बल्कि आत्मघाती है।

चुप्पी का षड्यंत्र: मीडिया और तंत्र की भूमिका
इस पूरी त्रासदी का सबसे दुखद पहलू मुख्यधारा की मीडिया की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ है। 30 लाख लोगों का भविष्य दांव पर है, लेकिन राष्ट्रीय विमर्श से यह मुद्दा गायब है। इसके पीछे के कारण स्पष्ट हैं:-

हितों का टकराव: मीडिया संस्थानों पर उन्हीं कॉरपोरेट घरानों का प्रभाव है जो इस जमीन के खरीदार हैं।
टीआरपी का खेल: भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों के शोर में, भूख और विस्थापन की चीखें टीआरपी नहीं बटोर पातीं। धर्म और जाति की बहस ने बुनियादी सवालों को हाशिये पर धकेल दिया है।

अस्तित्व बचाने की अंतिम लड़ाई
यह समय झारखंड के लिए आत्ममंथन का है। सत्ता और कंपनियों का गठबंधन ‘विकास’ की जिस सुनहरी तस्वीर को बेच रहा है, उसके पीछे का कैनवास काला है। आज झारखंड के नागरिक और विशेषकर आदिवासी समाज दोराहे पर खड़े हैं—या तो वे प्रतीकों और छद्म धार्मिक बहसों में उलझकर अपनी जमीन खो दें, या फिर अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संगठित हों।

अगर आज 30 लाख लोगों के आंसुओं को नहीं देखा गया, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। क्योंकि जब जमीन ही नहीं रहेगी, तो ‘झारखंडी’ होने का वजूद कहां बचेगा? यह लड़ाई अब मुआवजे की नहीं, वजूद की है।

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