हेडलाइंस का ‘अभिषेक’ और गलियों में ‘रक्तपात’
“जब अखबारों की स्याही सत्ता के चरणों को धोने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की खबरों को जिंदा जलाया जा रहा है।”
भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी ही परछाईं से डर रहा है, या शायद वह उस रोशनी में अंधा हो गया है जो सत्ता के गलियारों से छनकर आ रही है। साल 2025 का क्रिसमस केवल इसलिए याद नहीं रखा जाएगा कि देश के विभिन्न हिस्सों में उन्मादी भीड़ ने चर्चों में तोड़फोड़ की, या इसलिए कि नफरत की आग में बच्चों के मासूम चेहरों पर खौफ की इबारत लिखी गई। यह इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि भारतीय मीडिया ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह ‘खबर’ और ‘प्रचार’ के बीच का अंतर भूल चुका है।
जबलपुर से लेकर रायपुर और असम तक क्रिसमस समारोहों पर हुए हमले सोशल मीडिया पर वीडियो के रूप में तैर रहे थे, लेकिन अगले दिन देश के बड़े अखबारों के पहले पन्ने ‘शुद्ध और पवित्र’ थे। अमर उजाला और दैनिक हिन्दुस्तान जैसे पत्रों के लिए घर के भीतर ईसाइयों के साथ हुई बदसलूकी खबर नहीं थी, बल्कि उनकी सुर्खियां पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की हत्या पर विलाप कर रही थीं। सवाल यह नहीं कि बांग्लादेश की घटना दुखद है या नहीं, सवाल यह है कि अपनी ही चौखट पर जलते घर को अनदेखा कर दूसरे के आंगन की आग को ‘लीड’ बनाना पत्रकारिता है या चयनात्मक एजेंडा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कैथेड्रल चर्च जाकर प्रार्थना सभा में शामिल होना और कैरोल की धुन पर उंगलियां थपथपाना एक बेहतरीन ‘कैमरा शॉट’ तो हो सकता है, लेकिन यह उस कड़वी हकीकत को नहीं ढक सकता जहाँ उनके ही दल के पदाधिकारी—जैसे जबलपुर की भाजपा उपाध्यक्ष—नेत्रहीन महिलाओं के साथ बदसलूकी कर रहे थे। एक तरफ रेवरेंड पॉल स्वरूप प्रधानमंत्री के लिए ‘बुद्धि और विवेक’ की प्रार्थना कर रहे थे, तो दूसरी तरफ उसी समय सत्ता समर्थित हुड़दंगी ‘धर्मांतरण’ का फर्जी अलाप गाकर प्रार्थनाओं में भंग डाल रहे थे।
प्रधान सेवक की यह चुप्पी और मुख्यधारा के मीडिया का यह ‘मृदंग वादन’ उस खौफनाक अतीत की याद दिलाता है जब 1999 में ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों को जिंदा जला दिया गया था। क्या हम एक बार फिर उसी नफरत को ‘विकास’ और ‘विभूतियों के सम्मान’ के नाम पर खाद-पानी दे रहे हैं?
मीडिया का काम था प्रधानमंत्री के चर्च जाने के पीछे की ‘केरल चुनाव वाली राजनीति’ को बेनकाब करना, जैसा कि द टेलीग्राफ ने किया। लेकिन अधिकांश अखबारों ने सरकार के इस दावे को ही सच मान लिया कि ‘आज हर विभूति को सम्मान मिल रहा है’। यह विडंबना ही है कि जब आम आदमी सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए त्रस्त है, तब सरकार दशकों पुराने नेताओं को मरणोपरांत सम्मान देकर अपनी पीठ थपथपा रही है और मीडिया उस थपथपाहट को ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ बताकर छाप रहा है।
अगर मीडिया इसी तरह अपनी आँखों पर सत्ता की पट्टी बांधे रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का नारा केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह जाएगा। जो बच्चे आज असुरक्षा के साये में बड़े हो रहे हैं, वे कल अपनी नागरिकता का हिसाब माँगेंगे। तब यह मीडिया क्या जवाब देगा कि जब संविधान की धज्जियां उड़ रही थीं, तब वह प्रधानमंत्री की ‘फिंगर टैपिंग’ का वीडियो प्रमोट करने में व्यस्त था? सरकार की छवि बनाना विज्ञापन एजेंसियों का काम है, मीडिया का नहीं। खबरों का यह ‘अभिषेक’ बंद होना चाहिए, वरना इतिहास मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, बल्कि उसका ‘कब्रिस्तान’ लिखेगा।
(आलेख: प्रदीप शुक्ल)




