बुधवार, जनवरी 21, 2026

भगत सिंह की 118वीं जयंती: क्या ‘जेन-जी’ पूरा कर रही है शहीद-ए-आज़म के सपनों को?

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आज, जब हम महान क्रांतिकारी और विचारक शहीद भगत सिंह की 118वीं जयंती मना रहे हैं, यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या उनके सपनों का भारत बन पाया है? भगत सिंह ने जिस शोषण-मुक्त और न्यायपूर्ण समाज की कल्पना की थी, उसकी स्थापना आज भी एक अधूरा सपना है। लेकिन इस सपने की लौ को आज की युवा पीढ़ी, जिसे ‘जेन-जी’ कहा जाता है, दक्षिण एशिया के कोने-कोने में जलाए हुए है। यह लेख भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिकता और आज के युवा आंदोलनों में उनकी प्रतिध्वनि का विश्लेषण करता है।

अमर शहीद के विचार, जो आज भी ज़िंदा हैं

भगत सिंह और उनके साथियों का सम्मान भारत का हर वर्ग करता है, लेकिन उनके असली विचारों से आज भी शोषक वर्ग घबराता है। वे केवल एक “महान स्वतंत्रता सेनानी” नहीं थे; उनका उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना था, जहाँ एक इंसान दूसरे इंसान का और एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का शोषण न कर सके। वे युवाओं को धर्म, जाति और संकीर्णता से ऊपर उठकर वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि किसी भी बड़े बदलाव की अग्रिम पंक्ति में युवाओं को ही रहना होगा, जैसा कि नौजवान भारत सभा के घोषणा-पत्र में कहा गया है: “मानव-प्रगति का सम्पूर्ण इतिहास नौजवानों के साहस, आत्मबलिदान और भावात्मक विश्वास से लिखा गया है।”

दक्षिण एशिया में गूंजती भगत सिंह की आवाज़

भगत सिंह के विचार केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। हाल के वर्षों में, दक्षिण एशिया के कई देशों में युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, और तानाशाही सत्ताओं के खिलाफ़ ऐतिहासिक आंदोलन खड़े किए हैं।

नेपाल: नेपाल में ‘जेन-जी’ ने भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और सत्ता से चिपके नेताओं के खिलाफ़ एक सफल लड़ाई लड़ी, जिसके परिणामस्वरूप ओली सरकार को सत्ता से हटना पड़ा।

बांग्लादेश: महंगाई और भाई-भतीजावाद से त्रस्त छात्रों और युवाओं के आक्रोश के आगे प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा।

श्रीलंका: आर्थिक बदहाली और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ युवाओं का गुस्सा इतना प्रबल था कि राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे को देश से पलायन करना पड़ा।

इन सभी आंदोलनों का मूल कारण युवाओं में बढ़ता असंतोष, बेरोज़गारी, और अपने भविष्य के प्रति असुरक्षा की भावना रही है।

भारत: लद्दाख से लेकर दिल्ली तक युवाओं का संघर्ष

भारत में भी युवा अपने अधिकारों और भविष्य के लिए लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। बिहार में ‘अग्निवीर योजना’ के खिलाफ़ सड़कों पर उतरे युवाओं से लेकर दिल्ली में एसएससी परीक्षा में धांधली के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों तक, असंतोष की ज्वाला हर जगह दिखाई देती है। उत्तराखंड में पेपर लीक के खिलाफ़ और लद्दाख में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं।

लद्दाख का अनसुना सत्याग्रह

लद्दाख का युवा आंदोलन आज के भारत की एक दर्दनाक सच्चाई बयान करता है। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद अपनी विधानसभा खो चुके लद्दाख के युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनकी प्रमुख मांगें गहरी और बुनियादी हैं:

लोकतांत्रिक अधिकार: वे नीति-निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विधानसभा की बहाली चाहते हैं।

छठी अनुसूची: अपनी आदिवासी पहचान, ज़मीन, और संसाधनों को बाहरी कॉर्पोरेट कब्ज़े से बचाने के लिए वे संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

रोज़गार और शिक्षा: सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा के अवसरों की भारी कमी ने युवाओं को निराश किया है।

पर्यावरण की रक्षा: हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और खनन से बचाने के लिए युवा चिंतित हैं।

सांस्कृतिक पहचान: वे अपनी अनूठी बौद्ध और शिया मुस्लिम संस्कृति को बाज़ारवाद के प्रभाव से बचाना चाहते हैं।

इस शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने की कोशिश की गई, जिसमें चार युवाओं की दुखद मृत्यु हो गई और कई घायल हुए। विडंबना यह है कि जहाँ नेपाल के ‘जेन-जी’ आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ मिलीं, वहीं लद्दाख के युवाओं के संघर्ष को भारतीय मीडिया में उतनी प्रमुखता नहीं दी गई।

क्या शहीदों के सपनों का भारत यही है?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने एक आज़ाद और लोकतांत्रिक भारत के लिए फाँसी का फंदा चूमा था। आज जब हम लद्दाख में लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करते हुए चार नौजवानों को खो देते हैं, तो यह सवाल दिल को कचोटता है कि क्या हमारे शहीदों ने ऐसे ही लोकतंत्र की कल्पना की थी?

नौजवान भारत सभा ने कहा था, “जब नया उत्साह, नई आशाएँ और नए जोश के साथ काम आरंभ होता है, तो इसमें मनोबल कम होने की कोई बात नहीं है।” आज चाहे बांग्लादेश हो, श्रीलंका, नेपाल या भारत – युवाओं का यह संघर्ष भविष्य में एक बेहतर बदलाव का संकेत है। भगत सिंह के विचारों की सार्थकता इसी में है कि हम इन युवा आवाज़ों के साथ एकजुटता दिखाएं और एक सच्चे लोकजनवादी भारत का निर्माण करें, जो तमाम शहीदों के सपनों को साकार कर सके।

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